सुशांत के बाद किसकी बारी है ?


सुशांत सिंहः राजपूत के बाद किस की बारी है आत्महत्या करने कि ?क्या आप जानते है ? पर आत्महत्या होगी उसे रोका नही जा सकता । आत्महत्या करने के कारण की हत्या नही हुई है वो अब भी खुली हवा में सांसे ले रहा है । क्या हम और आप जानते है कि वह क्या कारण है? क्या आप और हम रोकना चाहते है?? तो हमे समझना होगा उस कारण को ,उस मानसिक  दबाब को। हमे समझना होगा दो वर्गो के बीच के युद्ध को जो इस देश के भीतर लडा जाता रहा है । शेखर कपूर जी, मुकेश भट्ट जी और कंगना रौनावत जी ने जिस बात कि तरफ सकेंत किया है । उसका सीधा सा क्या अर्थ निकाला जा सकता है?क्या सुशांत को और उसके काम को फिल्म उधोग का वो वर्ग जिसका मोनोपोली  फिल्म उधोग पर विगत वर्षों से चला आ रहा है । वो एक मिडिल क्लास लडके को स्टार के रूप मे स्वीकार नही कर रहे थे ? क्या इस वर्ग को सुशांत सिंहः से और उसके किये गये काम से भय लगने लगा था ।क्या उनकी  मोनोपोली उनके हाथ से फिसल जायेगी ? इस लिए सुशांत सिंहः को और उसके काम को इतना इगनोर किया जाये इतना इगनोर किया जाये कि सुशांत सिंहः भयंकर मानसिक अवसाद में जीने लगे । इससे दो बात होगी या तो सुशांत सिंहः कुंठित हो कर ड्रग्स लेने लगेगे या जिससे एक समय के बाद वह काम करने के लायक नही बच पायेंगे। दूसरा रास्ता जो सुशांत सिंहः ने आत्महत्या का अपनाया । यह सच है कि हमारे पूंजीवादी समाज में सामंतवाद जीवित है । ठाकुर के कुएं से पानी वही पी सकता है जिसे  ठाकुर पानी पीने की आज्ञा दे । सुशांत शायद ठाकुर की आज्ञा के बिना ही पानी पी रहे थे और लोगो को भी पानी पीने के लिए प्रेरित कर रहे थे। एक राह उसने दी थी । मिडिल क्लास बिहार के गांव पूर्णिया का रहने वाला युवा बिना गाॅड फादर के फिल्म उधोग में अपनी जगह बनाने मे सफल हो चुका था। यह घटना मिडिल क्लास युवा के लिए एक प्रेरणा बन कर स्थापित हुआ था।  जो अब एक नकारात्मक रूप के साथ हमारे दिलो में बस गया है । क्या अब कोई युवा फिल्म उधोग के उस वर्ग से टक्कर लेने की कोशिश करेगा जो स्टार पैदा करते है ? यह एक प्रश्न सुशांत की मौत के बाद हमारे लिए रह गया । दरअसल सुशांत की मौत से हमे सबक लेने कि आवश्यकता है । हम जो गलतियां विगत सौ सालो से कर रहे है उसे अब बंद करना होगा । भारत आम लोगो का देश है और आम लोग ही खास लोगो को स्टार बनाते आ रहे है । पर जब कोई आम आदमी का बेटा अपनी प्रतिभा लगन मेहनत से उन खास लोगो के समकक्ष पहुंचता है  तो उसे क्या मिलता है ? सुसाईड,,बस भारत की आम जनता यह निर्णय ले ले कि वो आम लोगो की फिल्म देखेगे । जिसमें आम लोगो द्वारा आम लोगो के लिए ,आम लोगो की कहानी को आम लोगो द्वारा जीते हुए जो फिल्म बनेगी वही फिल्म हम देखेगे । जिसकी शुरू वात हो चुकी है कुछ लोग इस विचार पर काम कर रहे है।  अब भारत के लोगो को यह तय करना है कि वो ईद होली, क्रिसमस दिवाली पर रिलीज होने वाली फिल्मे देखेगे या वो फिल्मे देखेगे जिसमें उसका बच्चा, उसके गांव का युवा काम कर रहा होगा। जिसमे उसकी अपनी कहानी होगी।  उसके जीवन की महक होगी । भारत से स्टारडम की समाप्ति और सार्थक सिनेमा की शुरू वात तभी होगी जब भारत की जनता नकली फिल्मो के मोहपाश से मुक्त हो कर यथार्थ धर्मी फिल्मे देखेगी । जैसे कि बासु दा कि फिल्मो में देखने को मिलता है । जैसा कि सुजित सरकार की फिल्मो में देखने को मिलता है । जैसा की अमोलपालेकर की फिल्मो में देखने को मिलता है । जैसा  की आयुष्मान खुराना की फिल्मो में देखने को मिलता है।  इस श्रेणी में अभी और भी नाम है जो भारत की आम कथाओ पर फिल्म बना रहे है ।  परिवर्तन की मांग हो रही है । जिसमे संचार क्रांति भी विधायक भूमिका में है । अब सरकार रीजनल सिनेमा के लिए थियेटर और जरूरी संसाधन की व्यवस्था दे । तब देश के हर राज्य  फिल्म निर्माण के लिए आत्मनिर्भर हो जायेगा । हमारे पास विभिन्न रंग और विषय की फिल्में होगी । हमे फिल्मो में काम करने के लिए अपने गांव शहर राज्य छोड कर जाने की आवश्यकता नही पड़ेगी । तब शायद किसी सुशांत सिंहः राजपूत को आत्महत्या नही करनी पड़गी।  आपने इस लेख को पढ लिया है तो एक विचार पर विचार करे कि कल सुशांत सिंहः आपके घर में भी पैदा हो सकता है । उसके लिए इस दुनियां में जगह बनाये और सार्थक यथार्थ मनोरंजनपूर्ण फिल्म देखे जो आम आदमी के द्वारा आम आदमी की कहानी पर आम आदमी के लिए बनाई जाये 
ऊ शांति 

रवि कांत मिश्र 

Comments

  1. Ye sadiyo se chale aarahe punji wad ki manmani ko rok lagni hi chahiye tab hamare pidhi ka koi bhavishya hogo
    Raviji...suruvat ke liye satsat naman

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