सत्य साई की मायावी दुनियां और मैं
नाटक गौतम बुद्ध पर हो रहा था। मै अपने विचार में स्पष्ट था । मैने सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध होने की घटना को मंच पर स्थापित किया था । सारी तैयारी हो चुकी थी । संवाद सगीत की रीकांडिग जमशेदपुर के चीन्टू स्टूडियो में कर लिया गया था। अब एक्टर मंच पर वाइस के साथ लिप्स मैच कर अभिनय करने का प्रयास कर रहे थे । इस क्रम में पहली समस्या आई की एक्टर असहज हो गये । एक तो वाइस किसी की उपर से मैच करते हुए चेहरे पर एक्सप्रेशन लाना बहुत ही मुश्किल हो रहा था । मैने कहा तुम लोग अपने संवाद को उसी लय मे जोर जोर से बोलो जिस लय में रिकार्डिंग हुई है और तुम्हे याद रखने होगा कि यह मशीन से मानव की लडाई है । इसलिए तुम चाल सेकेंड पहले से शुरू हो जाओ संवाद जब शुरू होगा तो वह तुम्हे फोलो करेगा ।तुम रिकाडेड वाइस को फोलो मत करो ।बस याद रखना संवाद का लय और गति । जहां विराम है उसे महसुस करना । मेरा यह आईडिया काम कर गया । लडकियो ने पकड़ना शुरू कर दिया और एक सप्ताह में नाटक मंच पर दौडने लगा । यह मेरे लिए एक अलग तरह का अनुभव था । अब नाटक का सेट बना। स्लाईड बना, एक बरगद के विशाल पेड कि तस्वीर लेने हम तीन लोग बलराज सरदाना जी ,मैं और एक सरदार जी जिनका नाम शायद गुरुशरण सिंहः था सभी टाटा घाटशिला रोड पर कार से सुबह निकले और कई बरगद के पेड देखे ,,पर मैं जैसा चाह रहा था वैसा नही मिल रहा था । घाटशिला के पास एक गाव में वो पेड मिला जैसा मैं चाहता था । बलराज सरदाना और सरदार गुरुशरण जी का मै आभार व्यक्त करता हूं कि उन दोनो ने मेरे विचार को मूर्त रूप देने में सहयोग दिया । शाम को हम सभी पेड की तस्वीर ले कर जमशेदपुर पहूंचे । नाटक में एक स्थान पर पेड की स्लाईड स्क्रीन पर आना था। स्लाईड ऑपरेटर के रूप में बलराज सरदाना हमारे साथ थे । उनका काम के प्रति डेडिकेशन और एकाग्रता ने मुझे प्रभावित किया ,वैसे सरस्वती राव और गीता जी का डेडिकेशन को मै नमन करता हूं । नाटक का कोस्टूयम में एक नई बात शामिल हो गई कि लड़कियां है इसलिए कोस्टुयम से पहले उनको स्किन कलर का कुरता पाजामा पहननी होगी । जो शरीर को पुरी तरह से ढक लेगा । पैरो में मोज़े ताकी शरीर का कोई भी अंग सिर्फ चेहरा छोड कर मंच पर दिखाई नही देना चाहिये । यह स्वामी यानी श्री सत्य साई के आदेश है । यही हुआ इंगलिश मीडियम की लडकियो को पुरी तरह बदल दिया गया आब वह वेद पाठ भी कर रही थी और गौतम बुद्ध के जीवन पर नाटक भी कर रही थी । नाटक का पहला मंचन जमशेदपुर माईकल जान ऑडीटेरियम में हुआ । नाटक सभी को पसंद आया । मै और मेरी टीम पास होगई तभी एक कोई श्रीमान झा थे उन्होंने ने एक बात कह कर नाटक की कथा को एडिट की मांग कर दी कि सिद्धार्थ और सारथी के पास से जब अर्थी गुजरती है उसे नाटक से हटा दिया जाये क्यो कि स्वामी के पास से अर्थी नही गुजारा जा सकता । इससे स्वामी को अच्छा
नही लगेगा। मेरा माथा भनना गया । मै बिना कुछ बोले उनकी सभा से भागा । बाहर आ कर गहरी सांस ली और फिर अपने आप से बोलो यह किस तरह के लोग है । जो सत्य घटनाओ पर प्रश्न उठा रहे। क्या अर्थी वाला सीन एडिट हुआ या इस पर भयंकर विवाद हुआ । नाटक नाटक की शर्तो पर हुआ या नही यह आगे हम लोगो जानेगे ।

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