श्री सत्य सांई की मायावी दुनियां और मैं
किसी रचना कार से उसकी रचना को अलग कर उसे तटस्थ खडा कर देना । यह अनुभव मुझे श्री सत्य साईं के डिवोटी ने दिया । मै अपनी पीडा से गुजरा ,यह पीडा कुछ इस तरह कि पीडा थी जैसे मां को बच्चे से अलग कर देना और संसार को बच्चा तो दिखाना पर बच्चे की मां को कही नेपथ्य में छिपा देना । गीता जी, चौधरी जी और सरस्वति राव जी अपनी बातो पर कायम थे । मेरा नाम निर्देशक लेखक के रूप में नहीं जायेगा । मैं थियेटर का बंदा बीच रास्ते में अपने स्टूडेंट का हाथ छुड़ा कर कैसे अलग हो सकता था । मैने सोचा चलो जीवन ने जब यह दिया है तो इसे भी गले लगा कर आगे बड़ते है । शो करूगा । शो के बाद जो कहना होगा तो कहूँगा या चुपचाप निकल जाऊंगा। यह जीवन का अनुभव बहुत कड़वा है इसे पी लेता हूं । बात मैने अपने तरफ से खत्म कर दी । रिहर्सल करने लगा । दो दिन हो गये । शो का कोई डेट नही मालुम हो रहा था । मै रिहर्सल के बाद बाजार के तरफ घुमने निकल जाता। साथ मेरे सहयोगी संजय पंडित होते । जो थियेटर में मेरे अनुज थे । हम जी भर अपना गुस्सा निकालते। इनकी बातो पर । इनकी योजना का कुछ ठीक ठाक रूप रेखा समझ में नही आ रहा था । संगीत समाज के गुरू जी भी साथ गये थे । जिनके पास वेज और नोन,,,, चुटकुला का खजाना था बोल बोल कर हसाते और खुद भी हंसते । वह एक जिन्दा आदमी थे जिन्होन ने जिन्दगी के अर्थ को और व्यर्थ दोनो को समझ लिया था । वह अक्सर एक बात मुझ से कहते रवि जी कभी चलाकी मत किजियेगा पर चलाकी पकडियेगा जरूर । चलाकी करने से भीतर का कलाकार मर जाता है । सचमुच बंदे की बात में दम था और सदा रहेगा आज वह इस संसार में नही है पर उनकी यह बात और उनके बहुत सारे चुटकुले मेरे साथ आज भी चलते रहते है । किसी मोड पर मेरे कानो में उनकी आवाज आज भी टकरा जाती है दोस्तो कुछ इंसान से रिश्ता बहुत पुराना होता है कई जन्मों का वह हर जन्म में रूप बदल कर मिलते है । अपनी छाप छोड कर आगे बड जाते है। वह स्वामी के डिवोटी थे पर एक कलाकार के तौर पर डिवोटी थे । संगीत की साधना करते हुए स्वामी को याद करते । जो उनकी इच्छा खाने पीने पहने की होती पहनते । सत्तर साल में भी जीने की इच्छा उनके भीतर किसी युवा की तरह भरी हुई थी । मैने उनसे कई बाते सीखी । आज वह स्थूल रूप से हमारे साथ नही है पर सूक्ष्म रूप से वह हमारे साथ है । उनकी एक समस्या थी चुकी हम तीन लोग एक ही जगह ठहरे हुए थे । उस बडे से हाल के अंदर छोटे से केबिन में । बाथरूम करीब छः सात थे लोग करीब साठ सत्तर होगे। बाथरूम का उपयोग करते । जब वह वाथरूम मे जाते तो उनको शांति चाहिये पर कोई ना कोई आ कर उनका दरवाजा खटखटाकर पूछता कौन हे भीतर ,,वह नाराज हो कर बोलते अरे बाबा हम है । तो फिर बाहर से सवाल होता क्या कर रहे है । बस वह गुस्सा हो जाते उल्टा सवाल करते कि वाथरूम में आदमी क्या करने जाता है । फिर क्या था वह वाथ रूम से निकलते और दुखी हो कर शिकायत करते रवि जी होते होते रह गया।पेट भारी लग रहा है । गरम पानी मंगवाता हूं । संजय गरम पानी लेने चला जाता । हम तीनो की तिगडी बनी हुई थी स्वामी के बेकरी से पिजाखाते काफी पीते । हा उनकी काली चाय नही मिलती थी । पर उसका जुगाड उन्होन लगा लिया। डिप डिप वाली चायपत्ती खरीद ली सुबह सुबह गरम पानी संजय कैटिन से ले आता था । उसमे वह चाय बना लेते थे । वह एक बेमिसाल इंसान मस्त मौला दुखो को फुटबाल बना कर किक मारते और अपने दुखो पर उन्होने कई चुटकुले बना लिये थे। जो मुझे धीरे धीरे पता चला था । चार दिन बीत गये । शो का कुछ पता नही चला । चौथे दिन सुबह सरस्वती राव जी एक बडा पैकट लडू का लेकर आई हम लोग रिहर्सल कर रहा थे । उन्होंन लडू का पैक्ट खोलते हुए बोली स्वामी ने आज मुझे कुछ कहा है शो होगा ।मेरी समझ में कुछ विशेष नही आया मैने कहा चलो भईया लडू पर ध्यान दो मेरे स्टूडेंट को लडू खाने मिल रहा है । हम सभी ने जम कर लडू खायें। सरस्वती राव जी का डिवोशन गजब का था वह ट्रेन में भी ध्यान करने बैठ जाती थी । गीता जी की सेवा और विश्वास गजब का था । एक रात मेरी नीद॔ करीब एक या दो बजे के बीच खुल गई और मुझे भूख लग गई । मैने संजय से कहा संजय मुझे भूख लख रही है कुछ है क्या ? उसने कहा भैया कुछ नही है । यह बात दूसरी तरफ सो रही गीता जी सुन ली वह उठ गई और बोली ठहरिये मै कुछ करती हूं और उन्होने हाल में एक चक्कर लगाया और वापस लौटी तो उनके हाथ में अखबार का टुकड़ा था जिसमे ठेकुआ था । ( बिहार के घर में बना पकवान ) जो छठ पूजा में विशेष कर बनाया जाता है । हम लोगो ने रात दो और एक के बीच ठेकुआ का भोग लगाया । निशाचर की तरह ठेकुआ मै और संजय दोनो खायें ,पानी पी कर सौ गया । गीता जी का ममताभरी रूप दिखने को मिला । रात हम जैसे भूखो को दूसरे से ठेकुआ मांग कर खिलाई । बहरहाल हम फिर सुबह गणेश गेट से बाहर निकल गये । हमारे और संजय कै बीच यह बात होने लगी यार यहां जो भी डिवोटी मिलता है । सबके पास स्वामी को लेकर एक चमत्कारी कहानी है । फिर अंत इस बात से होता है कि स्वामी भगवान है । सभी स्वामी पर डिपेंड दिखाई देते है । पर संजय गौतम बुद्ध ने तो भगवान के विचार पर कुछ कहा ही नही। अब इस नाटक में सिद्धार्थ को जब ज्ञान हो जाता है तब तथागत ने जो चार आर्य सत्य का ज्ञान संसार को दिया उसमे पहला जीवन में दुख है ।।दूसरा दुखो का कारण है ।। तीसरा दुखो का समाधान है ।।चौथा दुखो से मुक्ति है ।। इसमे भगवान तो कही नही है । वह भी व्यक्ति सत्ता वाला भगवान । फिर गौतम बुद्ध ने स्वयं को अवतार नही कहा ।वह एक भिक्षु के रूप मे जीवन को जीये । पर यहां तो स्वामी के पास जो लोग आ रहे है उसमे से अधिकतर लोग अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए आ रहे है । स्वामी के मैसज को जीवन में उतारने या उस मैसज को जीने की इच्छा से प्रबल मनोकामना पूर्ति महत्वपूर्ण है । देखते नही सुबह शाम दर्शन के वक्त लोग स्वामी को अपने लिखे पत्र देते । उन पत्रों में इन भक्तों की इच्छा है । यार मुझे तो यह दिखाई देता है कि इतने सारे लोगो की इच्छा के भार तले स्वामी छुपते दिखाई देते है । स्वामी ने मानव सेवा के लिए असंभव काम को संभव कर दिखाया । यह पूट्टापर्ति इलाका पानी से विहीन था यहां देखो पठार ही पठार है । पथरीली भूमि में जल खोजना और गांव गांव तक पानी पहुंचना। सही में एक चमत्कार लगता है । यह चमत्कार लोगो को उतना आकर्षित नही करता जितना की हाथ से विभूति निकाल कर देना । यह चमत्कार लोगो को अधिक आकर्षित करता है। कुछ तो है जो मिसिंग है और मिसिंग में कही वही हाल ना हो जाये जो हाल शिर्डी का हुआ है । शिर्डी साई मानवता का पाठ गरीबी में पढ़ते रहे । उनके जाने के बाद लोगो ने शिर्डी साई के वचन को दर किनारा कर साई को अपनी मनोकामना पूर्ति का साधन मात्र बना कर रख दिया। संजय हम बुद्ध पुरूषो के दर्शन को भूल जाते है बस वुद्ध पुरूष के स्थूल काया को पकड लेते है । यह मायावी है। बुद्ध पुरूष इसे समझाने का प्रयास करता रहता है पर संसारी लोग वही समझते है जो उनके स्वार्थ के साथ सिद्ध होता है । मैं लगातार बोलता जा रहा था संजय सुन रहा था । हम वापस लोटे तो एक मैसज चौधरी जी ने दिया की पैंतालीस मिनट के नाटक को तीस मिनट का करना है । यह आदेश उपर से आया है । दिमाग के भीतर यह सुन धडाम से बम फटा । यह सुन बच्चे रोने लगे कि उनका रोल कट जायेगा । बच्चो के माता पिता टीचर आ कर मुझ से रिक्वेस्ट करने लगे । मेरी समझ में कुछ नही आ रहा था कि यह क्या हो रहा है । मै क्या रखु और क्या काटू। अजीबो गरीब स्थिति थी । एक तरफ बच्चो का इमोशन दूसरी तरफ एक प्रोडूसर का आदेश । किसका पालन करू या किसका पालन नही करू ? समस्या यह भी थी कि पैंतालीस मिनट के नाटक का अभ्यास हम विगत तीन माह से कर रहे थे जो कि दिमाग के बीच में बेठ गया था । अब उसे मिटा कर तीस मिनट बच्चो के दिमाग में बैठाने था । समिति वालो को क्या था बोल कर चल दिये । काम तो मुझे करना था । मै कुछ नही बोला गुस्सा अपने उपर आ रहा था कि क्यो नही मैं मुम्बई चला गया । इस दर्द से कम से कम नही गुजरता पर अब कुछ नही हो सकता था । मै और संजय गणेश गेट से बाहर की तरफ तनाव दूर करने निकल गये ।

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