क्या आपके अवचेतन में पलता है आत्महत्या का भाव???
आपके अवचेतन में पलता है विनाश और सृष्टि के विचार । आत्महत्या कोई एक दिन की घटना का परिणाम नही होता । अगर आज कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है तो यह मान कर चले कि आत्महत्या का बीजारोपण उसके अवचेतन में कई वर्ष पहले हो जाता है । हम अपने प्रतिदिन के जीवन का अवलोकन करे और उसका लेखा जोखा करे तो आप पायेंगे की सकारात्मक भाव से कही अधिक नकारात्मक भाव को हमने भोगा है । हमे शिकायत है ,हम शिकायत के साथ जीते है । हमे निराशा है, हम रोज उस निराशा के बोझ को अपने मन में ले कर जीते है । हमे धोखा मिला है ,उसका दर्द और घृणा को मन में लेकर जीते है । दूसरे की सफलता पर जलन होता है उस जलन को लेकर हम जीते है । हम स्वयं पर अविश्वास करने लगते है । इस संसार से घृणा करने लगते है । ऐसा लगता है कि यह संसार में धोखा ही धोखा है । जीवन व्यर्थ लगने लगता है । जीवन में मित्र स्वार्थी मतलबी लगने लगते है । मानवीये संबंध पर विश्वास एक औपचारिकता भर रह जाता है ।इसके साथ जीवन की प्रतियोगिता में असफल होने का भय ,अपनी उपयोगिता को ना साबित करने का भय ,यह सब आज के मानव के अवचेतन में क्रियाशील है । और हम इसके साथ जी रहे है । ऐसी परिस्थिति में कोई और दबाब मन पर पडता है तो मन उस दबाब को सह नही पाता है और फिर जो कुछ भी होता है वो विनाशकारी होता है । हम क्या करे ?क्या मानव इस तरह के दबाब में जीने के लिए बाध्य है ? क्या मानव के पास तनाव और अवसाद में जीने का एक मात्र विकल्प शेष रह गया है ? क्या हमने अपने चारो ओर जिस जीवन का विस्तार किया है उसमे मानव के हिस्से अवसाद और तनाव ही आयेगा ? जी हां हमने जिस तरह जीवन को विकसित किया है उसमें तनाव अवसाद ही आयेगा, प्रतिदिन के समाचार पत्र न्यूज चैनल में जिस तरह के नकारात्मक समाचार प्रसारित किये जाते है । उसे आधार मान कर हम यह कह सकते है कि मानवजाति इस काल खंड में अवसाद और हिंसा में जी रहा है । जितना हिंसा वो बाहर कर रहा है उससे कही अधिक हिंसा वो अपने मन में कर रहा है । यह सारी बाते इस बात को प्रमाणित करती है कि आज कि फिल्म वेब सिरिज वही लोकप्रिय है जिसमे हिंसा अश्लीलता, षंडयंत्र अपशब्दो की भरमार हो। अब राजकपूर सहाब की फिल्म अनाडी का वो भोला भाला चरित्र जो सच बोल कर अपना ही नुक्सान करता है । अपने दर्द को छुपा कर दूसरे के लिए हंसता है । अब वह आज के काल में कही दब गया है । लोगो को इतनी हिंसा वाली फिल्म क्यो पसंद आती है ?क्यो कि उसके अवचेतन में हिंसा करने और हिंसा देखने की चाह है । आज की भाषा को ही ले ले बिना मां बहन की गाली के वाक्य पुरा ही नही होता । यह गाली किस बात का सकेंत है । हमारे अवचेतन में उबलते घृणा का संकेत है । ऐसी मनः स्थिति में हमारा मन जी रहा है । कम से कम नब्बे से पंचानबे प्रतिशत लोगो का अगर आंतरिक फोटो लिया जाये तो उसका रंग लाल निकलेगा । इतनी हिंसा और नकारात्मक ऊर्जा मानव ने अपने अवचेतन में भर लिया है । फिर भी हमारे देश में आत्महत्या की संख्या विदेशों की तुलना में कम है । भारत में जो दर्शन है और अध्यात्मिक ऊर्जा है वह बहुत हद तक हमारे अवचेतन पर काम करता है । साधु संत के विचार है उनका काम है ,उनका साहित्य है यह सब हमारे अवचेतन मन पर किसी ना किसी रूप में काम करता है । हमें अपने अवचेतन को साफ करने की आवश्यकता है । कैथारसिस की आवश्यकता आज प्रत्येक मानव को कैथारसिस की आवश्यकता है । मनो चिक्त्सको का काम, योग और ध्यान सीखाने वालो का काम ,कहानी और गीत सुनाने वालो का काम, नाटक और नाट्य प्रशिक्षण देने वालो का काम अति महत्वपुर्ण हो गया है । नाट्य प्रशिक्षण जिसमे (मेडिटेशन इन थियेटर) का महत्व अधिक है । लोगो को अपने नाकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलेगी और सकारात्मक ऊर्जा से जीवन रीचार्ज होगा । मित्रो नाट्य प्रशिक्षण अभिनय तक ही सीमित नही है वो मानव को सकारात्मक मानव में विकसित करने की क्षमता रखता है। मित्रो आज रोज अपने को सकारात्मक ऊर्जा से रीचार्ज करने की आवश्यकता है । तभी हम अपने अवचेतन में स्थित नकारात्मक भावो को समाप्त कर पायेंगे । आपने मेरे विचार को ध्यान से पढा जिसके आपका धन्यवाद आभार ।
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रवि कांत मिश्र
Bat to sahi hai aek sakartam vichar hi is halat se bahar la sakta hai
ReplyDeleteBilkul sahi h sir ji flim mafia ke khilaf ik nai rosani pradan kiya h is gatna ne.inka samuhik bahiskar hona chahiye.
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