श्री सत्य सांई की मायावयी दुनियां और मैं

संगीत समाज की पहली सुबह जब मै सौ कर उठा तो पंडित आनंद चंद्र चौधरी जी उठ चुके थे । किचन से कुछ आवाज आ रही थी । मै उठा कर किचन के तरफ चला गया । मैने देखा कि वह अपने लिए एक बडी सी केतली में चाय बना रहे थे जिसके मुहं से धुआं निकल रहा था । मैने उनके चरर्ण स्पर्श किये । वह बोले साईं राम इसके साथ ही बोले काली चाय पीयेगे । मैने कहा हां जरूरू । पर पहले वाशरूम से आता हूं । इतना बोल कर मै वाशरूम के तरफ चला गया ।वापस आया तो वह रिस्पशन में बैठे एक बडी वाली गिलास मैं भर कर चाय पी रहे थे । मेरे लिए भी एक गिलास चाय प्लेट से ढक कर रखी हुई थी । प्लेट उठा कर मैने देखा तो चाय गिलास के कंठ तक भरी हुई मेरी तरफ देख रही थी । मैने मन ही मन कहा इतनी चाय । फिर पीने का मन बना कर गुरू जी के पास वाली कुर्सी पर बैठ गया।  चाय की पहली चुस्की ली चाय नही कढाह था । सोचने लगा इतनी चाय कैसे पाऊगा? पर गुरू जी को देखा तो वह आराम से चाय पी रहे थे । काली चाय से ,वह भी इतनी स्ट्रांग चाय से मेरी यह पहली मुलाकात थी । शिष्टाचारवश मैं कुछ कह नही पा रहा था पर गुरू जी ने मेरे मन की बात को पढ लिया । वह बोले आपको चाय अच्छी नही लग रही तो ना पीये । मै दूसरी दूध वाली चाय बना देता हूं । पर मैने कहा नही मै पीना चाहता हूं । दरअसल मै उनको चाय बनाने की तकलीफ देना नही चाहता था । मैं चाय पी गया मुहं कसा कसा सा होगया पर चलो कोई बात नही । हां मै आपको बताना भूल गया कि सुबह मेरी नींद जब खुली तो गुरू जी ने टी वी पर हरि प्रसाद जी का बांसुरी बादन लगा रखा था।  मैं बहुत खुश हुआ मन ही मन ,मेरी आदत के अनुसार यह मेरी लिए एकदम सही था । आपको संगीत समाज के भवन के बारे में बता दूं । इसकी बनावट में ब्रिटिश शैली में देखने को मिलेगी । कमरे बडे बडे, छत की उचाई अधिक ,दीवारें मोटी मोटी और खिड़कयां  लंबी चौडी । इस तरह के पांच बडे बडे कमरे और फिर किचन बडा सा । एक गुरू जी का ऑफिस  और एक लंबा सा रिस्पशन ,फिर रिस्पशन से बाहर बडा सा गार्डन जिसमे करीब चार बडे बडे साल आम के वृक्ष । इसके साथ एक सात सो आठ सौ लोगो के बैठने वाला प्रेक्षा गृह जहां बीते शाम मेरा नाटक हुआ था । बहरहाल चाय पीने के बाद मै गुरू जी से विदा लेने लगा तो गुरू जी एक मोटी सी बडी सी पुरानी सी रजिस्टर ले आये और बोले आप पहली बार संगीत समाज में आये है । संगीत समाज के बारे में अपने अनुभव लिख दे । आपकी याद रह जायेगी । मैने जब रजिस्टर खोल कर देखना शुरू किया तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना ना रहा । बडे नामचीन संगीत कार संगीत समाज में आ गये थे।  जिसमे परवीन सुल्ताना ,उस्ताद बिस्मिला खां ,हरि प्रसाद चौरसिया जी , मैने एक बार गुरू जी के तरफ देखा तो आराम से बैठ कर गुडाखु दांत पर मल रहे थे। मुझे देख कर बोले गलत आदतों में यह भी एक शामिल है । मै उनकी बात सुन कर मुस्कुरा दिया । वह भी मुस्कुरा दिये । मैं अपनी प्रतिक्रिया रजिस्टर में लिखने लगा । पर मन ही मन सोच रहा था कि इतने महान संगीतकार के साथ संगत किया हुआ व्यक्ति बिना अभिमान के सामने बैठा गुडाखु दांत पर मल रहा है । बेटा रवि जिन्दगी ने अच्छी सबक दी है । देख रती भर भी ईगो नही है ।एक हम है जरा सा टी वी पर क्या आ गये ।अपने को अलपचिनो के बाप समझने लगते है । बेटा पकड ले चरण । इनके पास ज्ञान का ही नही अनुभव का खजाना है । तभी गुरू जी बोले हरि प्रसाद चौरसिया मेरी शादी में रात भर बांसुरी बजाते रहे । मैने कहा जी, आप तो मुझे कल छुपे रूस्तम कहे थे असल मै तो आप छुपे रूस्तम है । इस पर वह बोले अब मेरा समय समाप्त हो रहा है और आपका समय अभी शुरू हुआ है । आपने आज की तारिख नीचे लिख दी ना । मैने कहा हां ,तभी मै जाने के लिए खडा हुआ उनका आर्शिवाद लिया । तब वह बोले समय निकाल कर आते रहियेगा। मैं गुरू जी और संगीत समाज से बाहर निकल कर सडक पर आ गया । एक आॅटो लेकर घर के तरफ निकल गया । रास्ते मैं एक बार फिर यह प्रश्न मन में गूंजा कि किसने टेप को आगे बडा दिया था । बाल बाल बच गया नही तो नाटक बीच में ही रोकना पड जाता । पहली बार एक चोट मेरे विश्वास को लगा था कि यह सब कुछ महज एक घटना थी या योजना बना कर इस घटना को अंजाम दिया गया था । बहरहाल बात आई गई निकल गई इस घटना पर फिर किसी ने बात नही की ।तुलसी भवन ने फिर इस नाटक में कोई दिलचस्पी नही ली । मै भी मुम्बई आने की तैयारी में लग गया । अभी दो चार दिन ही हुए थे मेरे लैडलाईन फोन पर गुरू जी का फोन आया फोनमेरी माता जी ने उठाया था । गुरू जी ने मैसज दिया की मै उनसे जा कर मिलूं।  उनके लिए एक बहुत बडा काम आया है । चुकी मैं मुम्बई आने की धुन में था । मै गुरू जी से मिलने नही गया । दूसरे दिन फिर उनका फोन  आया फिर माता जी ने उठाया । बात फिर वही हुई । माता जी ने मुझे डांट लगाई कि बुजुर्ग व्यक्ति है बुला रहे जा कर मिल लो । माता जी की बात मान कर मैं उनसे मिलने गया तो । उन्होने कहा एक नाटक लिखना है और निर्देशन भी करना है । श्री सत्यसाईं बाबा के भक्त पूट्टापर्ति में नाटक करेगे । आप स्टेट कार्डिनेटर सरस्वति राव जी मिले । मै आपको वहां भेजता हूं । इतना बोल कर वह फोन लगाने लगे । मै मन ही मन सोचने लगा कि यह काम में फंस जाऊंगा तो मुम्बई कैसे जा पाऊगा? तभी फोन पर बात हो गई कुछ समय बाद एक व्यक्ति आया और मैं  उसके साथ चला गया । टेल्को रिंग रोड के बगल वाले रोड पर सरस्वती राव जी का घर था । उनके पति टाटा मोटर्स के हास्पीटल में डाॅ के रूप में कार्यरत थे । पहली मुलाकात एक सुसंस्कृत महिला से हुई । मृदु भाषी साऊथ इंडियन एक्सेट से हिंदी बोलती थी । मुझे देख कर साईं राम बोली बदले मे मेरे मुख से भी साईं राम निकल गया फिर मैने सोचा अबे यह क्या है । तु तो अपने शैली में रह,, पर बात निकल गई तो फिर वापस नही ली जा सकती थी । उनके घरों के दिवार पर श्री सत्य साई की लंबी बडी तस्वीर टंगी हुई थी बाबा मुस्कुराते हुए आर्शिवाद दे रहे थे । मै मन ही मन सोचने लगा । बेटा रवि यह कहां बाबा के चक्कर में फसने जा रहा। बेटा निकल ले नही तो तु कही इन लोगो के लपेटे में ना आ जाये  और ऐक्टिंग  छोड कर साईं राम साईं राम करना शुरू कर दे । तभी मन ने कहा अबे ऐसा होगा नही काम तो मै अपने ही शर्तो पर करूगा । तब तक दुध में बनी चाय आ गई चाय देख कर मिजाज हरी हो गई पर फिर एकदम से गुरू जी काली चाय याद आई मुहं कसा सा होगया । मन ही मन सोचा चलो शुक्र है  यह मैडम दूध चाय पीती है । चाय पर बात आगे बडी नाटक करने की बात हुई । नाटक बाल विकास के बच्चे करेगे आपको उनको ट्रेड भी करना है नाटक लिखना है डायरेक्ट भी करना है । नाटक विद्यापति पर करना है । आपकी फीस जो भी होगी आपको दी जायेगी । फीस की बात सुन मन और गार्डन गार्डन हुआ । चलो इस लौहे के शहर में नाटक करने की फीस मिलेंगी ।,
यह सुन कर अच्छा लगा । अगली मिटिंग स्टेट प्रेसिडेंट एस बी चौधरी और बाल विकास गुरू गीता सरदना से आपकी  होगी । मेरा फोन नंबर सरस्वती राव जी ने ले लिया। मै जब विदा लेने के लिए खडा हुआ तो बोली आप भोजन करके जाये ।तो मैने कहा ठीक है मैं सगीत समाज में हूं । अगर भोजन वहां भेजवा दे तो मैं गुरू जी के साथ भोजन कर लूंगा।  मेरी बात मान ली गई । मै संगीत समाज वापस आ गया । गुरू जी को सारी बात बताई गुरू जी बोले मुझे आप पर पुरा विश्वास है आप अच्छा काम करेगे । कुछ देर बाद एक सज्जन एक बडी सी लंबी टिफ़िन ले कर आये जिसमे साऊथ इंडियन भोजन था हम दोनो के लिए ,हम दोनो ने जम कर भोजन किया।  भोजन करने के बाद गुरू जी बोले दोपहर हो गई है आप आराम कर ले।  मै भी सोचा यही ठीक रहेगा । दोनो जमीन पर विस्तर डाल कर सो गये । गुरू जी ने बेगम अख्तर को अपने टेप लगा दिया । उनके स्वर गूंजने लगे । वो जो हमे तुम्हे करार था, तुम्हे याद हो की नही , हम दोनो गाना सुनते सुनते सौ गये। यह आदत मेरी आज भी कि मै संगीत  सुनते सुनते ही  सोता हूं ।मित्रो इससे आगे जो हुआ उसकी कल्पना अगर मैने पहले कर ली होती तो मै मुम्बई भाग जाता पर ऐसा नही हुआ मै एक के बाद एक चुनौति में फसता चले गया । आप सभी का आभार ,आपने मेरी बातो को ध्यान से पढा इसके लिए आपका शुक्रगुजार हूं । कृपा कर अपनी प्रति क्रिया blog पर करे और अपना नाम फोन नंबर प्रतिक्रिया के साथ जरूर लिखे । आपकी प्रति क्रिया की प्रतीक्षा के साथ फिर मिलता हूं 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏रवि कांत मिश्र 8757122773
 

Comments

  1. Bhai pyas bani hui
    hui hai...kal milte hai

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    1. धन्यवाद ,अपना नाम और सेल नंबर जरूरलिख दे । 🙏🙂

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