सफर अभी बाकी है

वो रहस्य ,रहस्य था ही नही, जिसे हम अपना रहस्य समझ कर जी रहे थे । उस पर पर्दा उसने कब का उठा कर खुद मेरे लिए रहस्य बन गये थे । हम तो यह सोच कर अपने रहस्य से परदा उठाये की वह हमे माफ कर देंगे ,पर वह तो हमे कब का माफ कर बैठे थे । तुम वही हो जो तुम पहले थी और अब भी तुम घर और बाहर वही हो ,हम तुम से अब भी लौ लगाये बैठे है जबकि तुम मेरी वो नही जिसे पर  हम अपना सब कुछ लुटाये बैठे है । तुम तो पहरेदार हो उसूलो के ,हम तो मेखाने को अपना घर बनाये बैठे है ।मैम हम तेरे लिए एक बला हो सकते है पर मेरे दिल में झांक कर देखो हम तुम्हे अपना खुदा बनाये बैठे है । मुझे नही पता यह ख्याल कहां से आता कहां चला जाता है हम तो उसके हर ख्याल को अपने दामन से लगाये बैठे है 
तुम और  तुम्हारा ख्याल है, तुम्हारी तस्वीर है ,जो चलती है संग संग कभी किसी राह से उसका नाम नही पूछती  है ।  मंजिल तो है ही नही उसके मन में ,,क्यो की वह तो अपने मंजिल के साथ सफर करती है अपने मंजिल के साथ सफर करती है ।दोस्तो  सफर अभी बाकी है ।।सफर अभी बाकी है । इतना लिख कर अ ने पेन को लैटर पैड पर रख दिया और मैम के तकिये पर सिर रख अपनी ऑखे बंद कर ली। रात जो उसके विस्तर के पास ठहर उसकी कहानी सुन रही थी ।उससे विदा ले कर अपने सफर पर निकल गई । दोस्तो अजीब नशा है जिन्दगी अगर उसके हर  प्याले में इश्क उतर जाये। नही तो जिन्दगी से बड़ी कोई सज़ा नही अगर अपने महबूब का नाम शख्स भूल जाये ।,मुझे याद रहे तेरा नाम, यही आरजू है मेरी, आखिरी तमन्ना है मेरी, कि मौत को भी इश्क के किस्से सुना सकूं, यह आखिरी दरखास है मेरी । अ बंद ऑखों से सब देख रहा था । आज जीत भी उसके भीतर खामोश बैठा उसे सुन रहा था। उसे पहले से मालुम था कि इस बीच बोलना गुनाह हो जायेगा ।जिसे अ तो क्या वह खुद भी खुद को माफ नही कर पायेगा । दोनो खामोशी के साथ ख्यालो के लहरो को अपने भीतर लहराते अपने मन के किनारे टकराते महसुस कर रहे थे । कल फिर सुबह होगी ,हम उसी सफर पर निकल जायेगे जिस पर हर सुबह निकल कर हर शाम हम वापस घर लौट आते है। यह भी जिन्दगी है जो रोज खुद को दोहराती है । कल हम भी दोहरायेगे ,पर इस खेल में नई बात होगी कल शाम उनसे फिर एक मुलाकात होगी । जो हमें थोडा पागल समझती है और खुद को मेरा हकीम।  चलो ठीक है देखते है कौन पागलपन से बाहर निकलता है या  पागल के साथ पागल हो जाता है । अ को नींद आने लगी,  । रात गुजर गई सुबह हुई ।अ अपनी साईकिल लेकर निकल गया स्कूल के लिए ,कुछ दूर तो वह साईकिल स्कूल के रास्ते चलाता रहा फिर एक मोड पर उसने साईकिल उस सडक पर मोड दिया जो शहर बाजार के तरफ जाती थी।  यह देख जीत चीखा अबे क्या कर रहा है ? क्या आज स्कूल नही जायेगा ? स्कूल ही जा रहा हूं पर आज जिन्दगी के स्कूल मे अपनी अटेडेसं लगाऊंगा। इतना बोल अ आगे निकल गया । उसके रास्ते में आज सब कुछ नया था लोग नये थे ,आसमान में उसके साथ चलते बादल नये थे । पंछियों का झुंड जो उसके सिर के उपर से गुजर  जाते थे वो नये थे । जब उसकी साईकिल पुल के उपर पहुंच तो उसने नीचे बहती हुई नदी को देखा जो उसके लिए नई थी अभी अभी बह कर आगे जा रही थी । कारखाने के चिमनियों से निकलते लाल पीले काले धुऑ आकाश में जो चित्र बना रहे थे वो आज नये थे । अ अपनी मस्ती में किसी आवारा बादल की तरह बस चलता जा रहा था । ना कही पहुंचने की जल्दी ना किसी का टोक टाक ,,यह स्कूल जैसी बोरिंग व्यव्स्था को किसने जन्म दिया होगा ? जिसने भी जन्म दिया होगा बहुत ही नीरस बेस्वाद जिन्दगी से निराश आदमी होगा । साले एक ही कमरे में साठ बच्चो को बैठा कर एक ही डंडे से सबको हांक रहे है जब कि हर बच्चा अलग है ।खैर छोडो आज इस नई पाठशाला में कुछ सीखने की कोशिश करते है । यह सोचते हुए वह बाजार पहूंच गया ,देखा तो हर आदमी ग्राहक को अपने तरफ खीचने की कोशिश कर रहा है । यह देख उसे फिजिक्स का चुंबकिये नियम याद आ गया कोई कण तभी किसी चुंबक के तरफ खीचेगा जब उसकी दिशा ठीक होगी । दुकानदार चुंबक है और ग्राहक वो कण जिसे चुंबक को अपनी तरफ खीचने है । बस यहां इच्छा और जेब की दिशा ठीक होनी चाहिये । वाह ऐसे तो यहां हर कोई एक दूसरे को अपनी तरफ खींच रहा है । क्या मै मैम के तरफ और मैम मेरी तरफ हम दोनो एक दूसरे के तरफ खींचे चले जा रहे । यह सब हो रहा है और मै इस होने साथ हूं । तभी उसका ध्यान एक नट पर गया जो रस्सी पर चलते हुए आगे बड रहा था । उसके हाथ में एक डंडा था जिसे ले कर वह आगे बड रहा था । नीचे एक आदमी जोर से ढोल बचा रहा था ,,लोगों की भीड उसे चारो ओर से घेरे थी ।अ भी साईकिल ले कर उसी भीड में शामिल हो गया। जिन्दगी के बैंलेस का खेल देखने लगा । जिन्दगी में जिसने बैंलेस करना नही सीखा वह नीचे गिर जायेगा,,जैसे  ही इसका बैंलेस बिगड़ा यह नीचे गिर जायेगा । वाह जिन्दगी में बैंलेस का फार्मूला,,,नीचे भीड कितना भी शोर मचाये ,,फोकस अपने लक्ष्य पर बनाये रखो । कभी बैंलेस नही बिगड़ेगा। यह प्रयोग तो स्कूल में दिखाना चाही था कि हाऊ टू कंट्रोल आवर माईंड।  फोकस करो फोकस करो टीचर सिर्फ बोलते है कभी किसी टीचर ने करके नही दिखाया ,,पर आज इस छोटी सी लडकी ने यह करके दिखाया,। लड़की नीचे जमीन पर उतर गई थी और सभी से पैसे माग रही थी अ ने उस बच्ची को पांच रूपये का नोट दिया तो उसके चेहरे पर बडी सी मुस्कान आ गई। एकदम सोलह आने सच्ची मुस्कान । अ का दिल खुश होगया वह साईकिल लेकर आगे बड गया । सामने थियेटर था फिल्म लगी थी सरगम ,,अ ने पोस्टर देखा मन हो गया की आज फिल्म देख ली जाये ,साईकिल पार्क कर टिकड खिडकी की लाईन मैं लग गया, दस लोगों के बाद उसका नंबर था लोग धीरे धीरे आगे बडते जा रहे थे । उसका नंबर जैसे ही आया उसने अपना हाथ खिडकी के छोटे से होल में घुसा दिया । तभी बाहर से किसी ने उसका हाथ जोंर से खीच कर खिडकी से बाहर निकाल लिया। यह सब कुछ बहुत तेजी से हुआ। अ को पहले तो एक झटका सा लगा फिर जब उसने देखा की मैथ के टीचर दास सर सामने पान खाते हुए गुस्से से उसकी ओर देख रहे थे । मामला समझ में आ गया दास सर मेरी साईकिल पर मुझे बैठाकर स्कूल ले आये। और फिर मुझे मेरे क्लास टीचर के सामने खडा कर दिया गया । सुचित्रा मैम अ को देखते ही समझ गई । दास सर बोले मै अपनी माता जी का दवा लेने बाजार गया तो मिस्टर आनंद थियेटर खिडकी पर टिकट लेते हुए पायेंगे। अब आप ही इसे पनिश करे आपका स्टूडेंट है । अ सिर झुकाये खडा सोच रहा था कल ही मैम के सामने वादा किया था । अभी चौबीस घंटे भी नही हुए वादा टूट गया । फिर उसके मन में मैम की आवाज गूँजी मैं तुम्हे पनिश नही कर सकती और कोई टीचर तुम्हे पानिश करे यह देख भी नही सकती । आज दोनो होगा । मैम कुछ पल तक अ को देखती रही फिर बोली एक लैटर लिखो अपने पापा को जो तुमने आज किया है । और उसमे यह कारण भी लिखो की तुमने ऐसा क्यो किया है । यह सुन दास सर चले गये।  अ समझ गया कि बिना पापा को लैटर लिखे गुजारा नही है । वह कामन रूम के तरफ चल दिया । लैटर लिख कर देने के बाद ही क्लास रूम में एंट्री होगी ,,,तभी जीत चीखा साले मना किया था पर नही मना अब भुगत । अ चुपचाप कॉमन रूम के भीतर चला गया ।रूम खाली था अ ने फैन आन किया और एक बेंच पर बैग रख कर बैठ गया । सब दास सर के कारण गडबड हो गी । मैथ के टीचर मैथ पढा पढा कर मैथ के सवाल  जैसे नीरस बदसूरत हो गये है । इनको कौन समझायें की जिन्दगी मैथ का सवाल नही है जिसे सोल्व किया जा सकता है । जिन्दगी कविता है कविता जिसे रोज हमे लिखना होता है । मैम को दुख हुआ यह मुझे कही मेरे भीतर पीन्च कर रहा है । शाम को नीम का पेड ले कर जाना है ,,जाना ही पडेगा ,,चलो जो पनिश करेगी मान लूगां ,,,,पर अभी तो लैटर लिख ले कुत्ते कही के ,,,तु कभी सुधर नहीं सकता और तुझे मेरे सिवाये कोई झेल नही सकता । चल जल्दी से अपने पापा को लैटर लिख । जीत गुस्से मे अ से बोला । अ चुपचाप बैग खोल कापी निकाल लिया और फिर वही पेन निकाला जो मैम उसे गिफ्ट की थी सोचा इस पेन  से एग्जाम लिखूंगा पर लिख रहा हूं पापा को लैटर ।  लिखता हूं ,, ,,,,,,,,,,,,,
आज इतना ही ,,
सभी मित्रो का आभार,,   
रवि कात मिश्र ❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
 
 
 

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

स्पर्श चिकित्सा (आलेख _ रवि कात मिश्र )

कलाकार की मौत