सफर अभी बाकी है

अ अभी घर के भीतर पहूंचा ही था कि वर्षा यानी अ की छोटी मां बोली मेजर सहाब का फोन आया था । उन्होने बताया की तुम फॉरेस्ट के तरफ चले गये थे। हां चला गया था अ अनमना तरीके से जवाब दिया और अपने कमरे के तरफ जाने लगा । तभी छोटी मां अ का रास्ता रोकते हुए बोली ,,मुझे तुम्हारी इस हरकत के कारण मेजर सहाब को साॅरी बोलना पड़ा।  क्या तुम्हे नही लगता कि तुम सॉरी फील करो । मैडम मैं मेजर सहाब को सॉरी बोल चूका हूं बात वही खत्म हो गई थी फिर उनको क्या जरूरूत थी आपको फोन करने की ? जरूरूत थी इसलिए उन्होने फोन किया छोटी मां थोडा गुस्से में बोली मैं तुम्हारी मां हूं इसलिए फोन किया । आप मेरे पापा की पत्नी है मेरी मां मर चुकी है और उसकी जगह आप नही ले सकती । आपको मेरे कारण जो शर्मिदगी उठानी पडी उसके लिए आई एम सारी मैडम ।इतना बोल कर अ तेजी से अपने कमरे में चला गया । तभी दादी जी बैठक में आई और बोली बहूं उसे माफ कर दो बिन मां का बच्चा है थोडा गुस्से हो जाता है पर दिल का सोना है सोना ,देखना एक दिन  वह तुम्हे मां कह कर पुकारेंगा । बस थोडा धर्य रखो और प्यार से काम लो । मां जी भगवान ने औलाद दी और बहुत जल्द छीन लिया । मेरी ममता मेरे मन में दबी रह गई । आनंद को देखती हूं तो जी करता है अपनी सारी मामता उसके उपर निछावर कर दूं । पर वह मुझे अपना दुश्मन मानता है । मैडम कहता है जब जब मैडम कहता है तब तब मेरी ममता को आघात लगता है । मैं क्या करू ? कैसे समझाऊँ कि वो एक हादसा था । उसमें मैने जान बूझ कर कुछ नही किया । मेरी गलती बस इतनी थी कि मैं कार का दरवाजा बंद करते वक्त भूल गई कि आनंद भीतर सोया हुआ है । आनंद उसकी सज़ा मुझे आज दस साल से दे रहा है । कोई बात नही बेटा तुम मुझे सज़ा दो । जब तक मन करे सज़ा दो । पर जिस बात कि सज़ा तुम मुझे दे रहे हो मेरे मन में तुम्हारे लिए वैसा कुछ नही था । मैने तुम्हारी हत्या करने की मंशा से कार लॉक नही किया था । वो एक मेरी भूल थी।इतना बोल छोटी मां रोने लगी ।दादी जी आ कर उनका सिर सहलाते हुए बोली चुप हो जा बंहू ,वो थोडा पगला है उसकी बात को दिल पर मत ले । बस सोच ले की उसका बचपना है समझदारी आ जायेगी तो अपने तेरे पास आ जायेगा । अब मेरे बाद तो तू ही है जो इस बनमानुष को संभालेगी । दादी छोटी मां को समझती जा रही थी । अ दरवाजे के पीछे खडा सब सुन रहा था । उसकी ऑखे बिलकुल खामोश थी। वह दरवाजे के पीछे से  कर बाहर निकला और बैठक में आ कर बोला । सॉरी ,,उसकी आवाज सुन छोटी मां सिर उठा कर अ के तरफ देखी तो अ उनसे कुछ दूरी पर खडा था । दादी मां बोली देख आनंद तुने जितना तंग करना था मुझे कर ,,पर अपनी छोटी मां को तंग करना छोड दे ,, तु नही समझ सकता मर्द जात है और तुझे समझाया भी नही जा सकता । बस इतना समझ ले यह तेरी मां है । और इनको मैडम मैडम क्या बोलता है रे ,, करमजले तु भाग्यशाली है कि तुझे इतना प्यार करने वाली मां दोबारा  मिली है । आज के बाद अगर तुने मेरी बहूं को मैडम कहा तो मैं तुझ से बात नही करूंगी । नही मां जी इस पर दवाब ना डाले ,रिश्ते दवाब से नही दिल से बनने चाहिये । आनंद जिस दिन अपने दिल से मुझे मां कहेगा मुझे उस दिन का इंतजार रहेगा । आनंद कुछ नही बोला बस एक नज़र दादी जी के तरफ देखा फिर छोटी मां के तरफ देखा और धीरे से पलट कर अपने कमरे के तरफ चला गया। 
सुबह सुबह प्रो सहाब के घर का काल बेल बजा । प्रो सहाब अलसाये हुए उठे अपने पजामा की डोरी बांधते हुए आये दरवाजा खोला।  तो समाने सुचित्रा बैग लिए खडी थी । प्रो सहाब का मुहं खुला का खुला रह गया । सुचित्रा ने तुरंत नोटिस किया की प्रो सहाब के चेहरे पर कई रंग आये और चले गये । अंत में उनके चेहरे का रंग उतर गया । तभी भीतर से किसी नारी की आवाज आई कौन है सर ? सुचित्रा और प्रो सहाब एक दूसरे को देख रहे थे उनके बीच उस नारी का स्वर गूंज कर खो गया । सुचित्रा कुछ नही बोली प्रो सहाब को थोडा सा धक्का देते हुए कमरे के भीतर चली गई ।  एक लडकी अपनी सलवार पहनने की कोशिश करते हुए काफी डरो हुई थी सुचित्रा के तरफ डर कर देखी । सुचित्रा उसे गौर से देखती रही फिर बोली तुम डरो मत ,तुम्हारी गलती यह है कि तुम एक शादी शुदा मर्द के साथ सोने लगी हो । जो अपनी बीवी का नही हुआ वह तुम्हारा कैसे हो सकता है ? क्यो प्रो सहाब आप इस कन्या का परिचय नही कारेगे । प्रो सहाब को काटो तो खून नही ।उनको लगा की उनके शरीर का सारा खून पानी हो गया । वह चुपचाप खडे रहे। सुचित्रा लडकी के तरफ देख कर पुछी तुम कब से प्रो सहाब के साथ रिलेशन में हो । लडकी डरते हुए प्रो सहाब के तरफ देखी प्रो सहाब बोले माया तुम जाओ,,,। हां माया तुम जाओ मैम बोली । माया किसी अपराधी कि तरह जाने लगी अचानक प्रो सहाब के पास रूक गई ।उनकी ऑखों में देखते हुए बोली सर मेरी पी एच डी तो पूरी हो जायेगी ना । प्रो सहाब बोले तुम जाओ बाद में बात करूगा । माया चली गई । सुचित्रा प्रो सहाब को देखती रही उनकी ऑखों से आंसू बहने लगे । सुचित्रा रोते हुए बोली मानस सब कुछ खत्म हो गया। खत्म तो बहुत पहले ही हमारे बीच हो चुका था। आज इस तरह से खत्म होगा इसका अनुमान नही था । मुझे दुख इस बात का है कि तुम्हारे कितने रूप है मै जिस रूप से जुडी थी वह कितना संवेदनशील रूप था एक युवक की भावना को ठेस ना लगे उसके लिए तुम अपनी पत्नी से कहे की तुम उसे प्यार दो । नही नही ,,वह झूठ था ,सच यह है कि तुम मुझ से छुटकारा पाना चाहते थे । इसलिए चाहते थे कि मै आनंद जैसे युवा के साथ इंगेज हो जाऊं और तुम यहां जीवन को अपने तरीके से जीओ । सुचित्रा देखो समझने की कोशिश करो ,,मुझे तुमसे वह नही मिला जिसकी चाह मेरे भीतर हमेशा से थी । मैं तुम्मे अपने भीतर की कविता को खोजता रहा । जिसकी प्यास को मैं बीस वर्षो से अपने भीतर लिए जीता रहा । तुमने मुझे प्यार किया ,सम्मान दिया , मेरा केयर किया ।मन फिर भी कोरा का कोरा रह गया । मैने कभी तुम्हारे स्पर्श को अपने मन की गहराइयों में नही महसुस किया । हम साथ साथ थे पर घर के दो दिवार की तरह जो आमने सामने तो रह सकते है पर कभी एक दूसरे से मिल नही सकते । एक खाली जगह हम दोनो के मन में था वो खाली जगह हम दोनो एक दूसरे के लिए भर नही पाये । उसी खाली जगह में  मै आज भी भटक रहा हूं,,और तुम भी भटक रही हो ,,मैं जानता हूं कि तुम उसी खाली जगह को भरने के लिए यहां तक चल कर आई हो । अच्छा हुआ मानस आज वह खाली जगह और बडी और गहरी हो गई । अब तलाक कैसे लोगे यह बताओ । और तुम्हारी किसी बात पर अब मेरा यकिन नही रहा । अब हमारे पास बात करने के लिए कुछ नही बचा है । हम दोनो मेच्योर है । एक अच्छे इंसान की तरह एक दूसरे से अलग हो जाते है । यह सुन प्रो सहाब बोले रूक जाओ जल्दी बाजी होगी । थोडा रूक जाओ । शायद हम दोनो उस खाली जगह को फिर से भरने की कोशिश करे । कमाल करते हो मानस ,,अब भी इतना कुछ होने के बाद भी खाली जगह भरने की बात करते हो । तुम कंपनसेशन नही देना चाहते हो ।तो मत दो बस मुझे इस संबध से छुटकारा दे दो । अब और एक पल भी मुझे तुम्हारी पत्नी बन कर जीने की इच्छा नही है ।
मैं वापस जा रही हूं तुम पेपर तैयार करवा कर मुझे भेज देना । गुडबॉय मानस ,,इतना बोलते बोलते सुचित्रा का गला ऑसू से रून्ध गया। वह तेजी से कमरे से बाहर निकली दरवाजे को पार कर बाहर निकल गई । प्रो सहाब खामोश खडे देखते रह गये । घर सुना हो गया था और बाहर सब कुछ सुना दिखाई दे रहा था । सुचित्रा दस साल के संबध को छोड आगे निकल गई थी । सुबह का समय था फुटपाथ पर तेजी से चली जा रही थी । जाना कहां था उसे मालुम नही था । बस इस समय वो चली जा रही थी । चाहती थी कि वह इस शहर से दूर चली जाये । मानस की हर उस याद से दूर चली जाये । झूठ की बुनियाद पर संबध चल रहे थे सच की आंधी ने जडे उखाड़ कर फेंक दी । सुचित्रा का चलते चलते ऐसा लगा कि उसके शरीर से उर्जा बह कर निकलती जा रही है । उसका सिर  घुमने लगा था उसे लगा कि वह जमीन पर गिर जायेगी । सामने एक तालाब था जहां लोग उसके किनारे टहल रहे थे । सुचित्रा अपने आपको किसी तरह संभालते हुए ताल तक पहुंची और जमीन पर ऐसे बैठ गई जैसे हजारो मील  का सफर तय करके आई है । गहरी गहरी सांसे लेने गई । अपने बैग से बोतल  निकाल कर पानी पीने लगी । आधी बोतल पानी पी गई । तब उसे कुछ अच्छा सा लगा ।वह ऑखे बंद कर अपने शरीर को ढीला छोड दी । ठंडी हवा का एक झोंका तालाब के पानी से होता हुआ उसके शरीर को छुआ  और इसी छुअन के साथ उसे लगा कि आनंद उसके पास बैठा हुआ है । वही गोलाकार काला पत्थर है । कमल के फुल है और आनंद के होने का एहसास उसे होने लगा ,,,सुचित्रा अपनी ऑखे बंद रखी वह एहसास को बंद ऑखों से जीना चाहती थी। उसे डर था कही ऑखे खोलते ही यह एहसास कही खो ना जाये ।
आनंद की आवाज उसे सुनाई दी मैम मैम आप बहुत मजबुत है आप कभी हार नही सकती । क्यो कि आपने ही कहा था कि सच्चे मन वाले लोग हार कर भी जीत जाते है ।अगर आप आज  हारी है तो भी जीत आपकी ही हुई है क्यो की आपका सच्चा मन आपके साथ है । आपने आज जीवन का एक अनुभव पाया है जो अनूठा है । सुचित्रा पहले से कही अधिक सहज होगई उसके मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगा। उसका कंपित मन अब दीपक की लौ की तरह स्थिर हो गया था । सुचित्रा ने अपनी ऑखे खोल दी । दूसरे ही पल उसका हाथ उसके गले में बंधे मंगल सूत्र पर गया सुचित्रा ने अपना मंगल सूत्र गले से बाहर निकाला उसे एक नज़र देखी ।मुस्कुरा दी ,फिर ताल के तरफ फेकना चाही पर तभी उसके भीतर से आवाज आई  ताल से आनंद की याद जुडी हुई है । उसमे मानस का दिया मंगल सूत्र फेक कर उसकी याद के साथ मानस की याद को जोड़ना अच्छा नही होगा । सुचित्रा मंगल सूत्र को बैग में रख दी  यह सोच कर कि तलाक कै पेपर के साथ यह उसकी दी हुई चीज वापस कल दुगी । सुचित्रा अपने जगह से उठी और मजबुत ,,  ,,,। 
आज इतना ही । 
आप सभी का आभार 
रवि कांत मिश्र।  🙏🏻❤🙏🏻

 

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