ष्री सत्य साई की मायावी दुनियां और मै
स्वामी के पास से मंच पर अर्थी गुजरेगी या नही इस बात को लेकर विवाद होने लगा । कुछ लोगो का मानना था कि इस सीन को काट दिया जाये।कुछ लोग इस सीन को काटने के हंक में नही थे। मैने अपना विचार स्पष्ट कर दिया कि यह सीन कटने का अर्थ है नाटक के चार सत्य से एक सत्य को अलग कर देना । इस बारे में स्टेट प्रेसिडेंट ने कह दिया कि अब जो होगा पूट्टापर्ति जा कर होगा । अभी हम कोई सीन नही काटेगे। उनकी बात को सुन लोग पीठ पीछे कहने लगे कि देखना नाटक का क्या हाल होता है । समिति में जाति की फिलिग॔ थी । साऊथ इडियन सोचते थे कि स्वामी साऊथ के है इसलिए उनका पहला हक है । इस पर नोर्थ इंडियन वाले यह कहते थे कि स्वामी सभी के है । मैं शुरू शुरू में समझ नही पाया कि चक्कर क्या ? पर धीरे धीरे सब समझ में आने लगा । मैने सोचा यह भारत की पुरानी समस्या है इसका कोई समाधान नही है । बस अपना काम करते रहो । हम सभी अक्टूबर के माह में पूट्टापर्ति के लिए निकल गये करीब एक सौ पचास लोग से कही ज्यादा की टीम बनी जिसमे स्कूल के टीचर प्रिंसिपल बच्चे भी शामिल थे । बाकि साई समिति के युवा वर्ग थे जो सेट को मंच पर लगाने और ले जाने के लिए काम कर रहे थे । रिकाॅडेट समय यानी दस से पंद्रह सेकेंड में सेट परिवर्तन का काम युवाओं ने किया । उसकी प्रशंसा करता हूं । बहरहाल हम लोग खडगपुर पहूचे वहां से एक ट्रेन थी । धरमावरम के लिए । उस समय प्रशाति निलयम स्टेशन बन रहा था । अभी खडगपुर पहूंचे कर दस बीस मिनट ही हुए थे कि यह समाचार मिला कि जिस ट्रेन में हमारा रिजर्वेशन था वह किसी कारण वह रद किया गया है । अब तो पुरे बच्चो में निराशा आ गई । मै चौधरी जी के पास गया वह पहले की तरह मौन थे । मैने उनसे ट्रेन की समस्या के बारे में पूछा तो उन्होने कहा कि स्वामी के काम में इस तरह कि बाधा आती रहती है और उसका समाधान भी होता रहता है । आप निश्चित रहे । करीब दो बजे यह कंफ्रम हो गया कि हम लोग इस्ट कोच से जा रहे । रिजर्वशन के बारे में कोई बात नही हुई । ट्रेन आई हम चड गये । करीब आधे घंटे में सभी को सीट मिल गई ।यह कैसे हुआ मै नही कह सकता पर यह हुआ ।इसका मै गवाह बना। लोग इसे स्वामी का चमत्कार मान रहे थे । मै चुपचाप बैठा यही सोच रहा था कि चलती ट्रेन में एक सीट कभी कभी मिलना संभव नही होता । चलो यह भी हो सकता है । शाम हुई और रात हो गई । चौधरी जी ने मुझे बुलाया अपने बोगी में ,,,मै गया तो वहां समिति के सीनियर लोग बैठे थे उन सभी को देख कर ऐसा लगा कि यह लोग बात विवाद करने का मन लिए बैठे है । चौधरी जी के पास बैठे किसी सज्जन ने यह कहा कि आप स्वामी भगवान के पास जा रहे है और आप नही जा रहे है स्वामी ने आपको बुलाया है इसलिए आप जा रहे है । स्वामी के आज्ञा के बिना कोई पूट्टापर्ति की धरती पर पैर नही रख सकता । मै यह सुन कर कुछ अपने को कठपुतली जैसा अनुभव किया ।मेरा मिजाज भडक गया । एक आदमी को यह लोग भगवान की तरह पेश कर मुझे मोहित करने का प्रयास कर रहे है । मै कब पीछे रहने वाला था मैने भी कह दिया कि मेरा जीवन मेरे कर्मो का परिणाम है । मै अपने कर्मो का भोग कर रहा हूं । इसलिए मुझे किसी भगवान के सामने जाने कि क्या जरूरूत है । इस पर चौधरी जी बोले जरूरूत है भगवान के दर्शन से पाप कटता है । मै उनकी बात सुन कर एक पल के लिए चुप होगया कि मैने कब पाप किये और किये भी तो उसके फल से मै भाग नही सकता । गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि तुम अपने कर्मो से बने हो । तो यह बीच में पाप कर्म को हरने वाले क्यो आ रहे है ? फिर गलत काम मैं करू और स्वामी को देख कर मेरे गलत कर्म का फल नष्ट हो जाये ,,यह तो ठीक नही है । कोई मेरे खराब क्रमों का भोग क्यो करे । मैने वहस करना उचित नही समझा । थोडी देर बाद मैं वापस अपने वोगी में चला आया । मन भीतर प्रतिक्रिया कर रहा था । मै किसी व्यक्ति को भगवान कैसे मान लू । मेरे लिए तो सारी सृष्टि ही भगवान है । फिर बिना अपने अनुभव के कैसे किस बात को माना जा सकता है । खैर हम लोग विजय वाडा दूसरे दिन पहूंचे और फिर वहां से ट्रेन शाम को मिली जो दूसरे दिन सुबह सुबह धरमावरम स्टेशन पहूंच दी । सब कुछ बदल गया खान पान भेष भाषा सब मेरे लिए बदल चुका था ।मेरे एक्टर के लिए भी बदल गया था । स्टेशन से बाहर बस हमारी सेवा में खडी थी बस स्टेशन पर फ्री नाश्ते का प्रबंध एक ग्रामिण अपने तरफ से कर रहा था। उप्मा पत्ते में डाल कर वो सभी को दे रहा था । तमिल में वह अपनी पत्नि को कुछ कह भी रहा था और मानव सेवा में लगा हुआ था । मैने और मेरे एक्टरों ने उप्मा का नाश्ता किया । मैने वैसा उप्मा पहले कभी नही खाया था और उसके बाद भी वो टेस्ट नही मिला । पता नही उस सेवादार ने क्या मिला दिया था शायद उसकी खुशी और प्रेम दोनो उप्मा में घुल गये होगे । उससे कहीं निस्वार्थ भाव से सेवा । पहली बार जीवन में कुछ ऐसा अनुभव हुआ जो पहले कभी नही हुआ था । किसी संत की लिखी बात याद आ गई
जैसी भावना से भोजन बनाओगे वैसा ही भोजन बनेगा । बहरहाल हम वहां से निकले सूर्य उदय हो चुका था मै बस कि खिडकी हे बाहर उगते हुए सूरज को साथ साथ चलते देख रहा था तभी प्रशाति निलयम स्टेशन आया जो लगभग बन चुका था । बाहर से देखने पर किसी पौराणिक काल का महल दिखाई दिया । यह साईं की पहली मायावी रचना को मैने देखी । उसके बाद सुपर हास्पीटल के पास जब बस रूकी तो मुझे लगा कि मै महाभारत या रामायण काल के किसी महल के पास खडा हूं । बाहर से वह किसी महाराजा का किला दिखाई दिया । लोगो ने मुझे बताया कि यहां लोगो का फ्री में ओपेन हार्ट सर्जरी होता है । चाहे वो धरती के किसी भी हिस्से का क्यो ना हो । स्वामी कहते है कि पैसो के आभाव में किसी बिमार की जान नही जानी चाहिये। यह पृथ्वी पर घोर गला काट महंगे स्वास्थ सेवा के युग में गरीबो के लिए आशा की किरण थी । मेरे मन मे स्वामी के लिए सम्मान का भाव आ गया । मैं सोचने लगा कि यह काम एक सदाहरण से गांव पूट्टापर्ति में रहने वाला इंसान नही कर सकता । जरूरू किसी महामानव का जन्म इस गांव में हुआ है। बहरहाल बस आगे बड गई । रास्ते में स्वामी की तस्वीर और होडिंग जगह जगह लगी हुई थी ।फिर श्री सत्य साईं विश्व विधालय संगीत विधालय बडे बडे सितार तबला बांसुरी भवन के द्वार पर बने हुए थे । यह एक मेरी लिए मायावी लोक जैसा लगने लगा था। यहां के वायु में बेली फूलों की महक थी और यहां की महिलाओ के जुडे में बेली फूल लगे हुए थे । जिसकी महक से वातावरण महक रहा था और वो महक हमारे भीतर समा गई थी। बस गणेश गेट के पास पहुँच गई । इसके बाद जो हुआ वो उसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता था । सब कुछ छिन भिन्न हो गया । मेरे दिमाग का तेल निकल गया ।
अगली कडी में ।
आपका आभार कि आपने मेरी आप बीती को ध्यान से पढा । मै आपका आभारी हूं।
सादर धन्यवाद
रविकांत मिश्र

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