सम्मान मिलने की खुशी और दर्द
सम्मान जब आपको मिलता है तो आपको खुशी तो होती है पर उस खुशी के साथ दर्द भी चला आता है । यह दर्द कोई और आपको नही देता है आपके आस पास रोज मिलने वाले जिसे आप अपना मित्र समझते है ,वही आपको यह दर्द देंगे। मै भुक्त भोगी हूं बीस साल के रंगमंच जीवन में पहली बार झारखंड से जमशेदपुर से मेरे नाटक "अंत से आरम्भ" को साहित्यकला परिषद नई दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान देनी की घोषणा हुई । बहुत खुशी हुई मै अपने सबसे नजदीक मित्र को फोन लगा कर सूचना दी ,,खुशी इतनी थी कि तुरंत मिलना हुआ । मित्र ने गले लगाया उनके साथ भी एक मित्र थे उनको कोई खास खुशी नही हुई बस औपचारिकता वश बधाई दे कर ऐसे मौन हुए कि फिर कोई प्रश्न ही नही किया वह अपने मोबाईल में व्यस्त हो गये । मै उम्मिद कर रहा था कि कुछ प्रश्न वह मुझ से पुछेगे पर नही । यह पहला दर्द का अनुभव हुआ कि इतने वर्षो तक साथ उठने बैठने सुख दुख बांटने के बाद आज सम्मान मिलने के बाद इतनी उदासीनता ,,,,,पर चलो कोई बात नही । मै अपने पहले मित्र के साथ बाते करने लगा और उसे धन्यवाद देने लगा कि तुम्हारे सहयोग के कारण मुझे यह एवाड मिला है । अगर तुम सही समय पर साहित्यकला परिषद का विज्ञापन मुझे नही देते तो शायद आज मुझे यह सम्मान नही मिलता । इस विज्ञापन के पीछे भी एक धोखा देने की बात एक्स नाम के मित्र कि है जिनके साथ रोज शाम को उठना बैठना था ।वो मुझ से एक नाटक लिखवाना चाहते थे मै सहमत भी होने वाला था तभी मोहन राकेश साम्मन की बात उठी और वह बोले कि इस वर्ष तो समय निकल गया है,, तुम अगले वर्ष कोशिश करना,, तभी मेरा ईमानदार मित्र वहां आ गया और उसने यह बात सुन ली ।उसने कहा कि रवि जी कल मै आपको सही तारिख बताऊंगा और दूसरे दिन शाम को वह अखबार कि कटिंग के साथ उस एक्स मित्र के सामने मिला और मेरे हाथ में अखबार की कटिंग देते हुए बोला कि अभी दो महिने का समय है आप नाटक लिख कर भेज सकते है ।यह सुन एक्स मित्र बगले झाकने लगा
मैं अपने जैकेट की जेब मे पेपर कटिंग डाल चुपचाप घर चला आया बात आई गई निकल गई । एक्स मित्र से मिलना और अपने ईमानदार मित्र से मिलना होता रहा । एक दो बार नाट्य लेखन पर चर्चा हुई एक्स मित्र ने एक अच्छा सुझाव भी दिया मैने उसका धन्यवाद किया और फिर अपने काम पर लग गया । नाटक लिखने के बाद हमारे शहर के डां सी भास्कर राव जो हिन्दी के प्रोफेसर और राष्ट्रिये स्तर के उपन्यास कार व्यंग्य कार उनके पास में नाटक की रीडिंग के लिए गया । मै उनको गुरू जी कहता हूं उनकी लेखन दृष्टि और सकारात्मक दृष्टि का मै मुरीद हूं । गुरू जी ने पुरी तन्मयता से एकाग्र हो कर नाटक को सुना नाट्य पाठ समाप्त होने के बाद उनकी बहुत ही सारगर्भित सकारात्मक प्रतिक्रिया आई रवि मैने अब तक जमशेदपुर में पहली बार इस तरह के नाट्य लेखन को सुना है बेटा कुछ मत सोचो किसी को कुछ मत बताओ ,,इसे मोहन राकेश नाट्य प्रतियोगिता में भेज दो मेरा यह विश्वास है कि यह नाटक कोई ना कोई स्थान अवश्य लगायेगा। मैने गुरू जी के चरर्ण स्पर्श किये और उनकी बातो की भरत वाक्य मान कर नाटक डाक द्वारा साहित्य कला परिषद् को भेज दिया । परिणाम आने के बाद गुरू जी को फोन द्वारा एवार्ड मिलन की सूचना दी वह बहुत खुश हो कर मुझे आर्शिवाद दिये अपनी बात याद दिलाते हुऐ बोले कि मेरा अनुमान सही निकला । मैने गुरू जी का आभार प्रकट किया और प्रेस वालो को यह सूचना दी जिसमे मेरे ईमानदार मित्र और गुरू जी के योग्यदान की चर्चा की । समाचार पत्रों में यह खबर छप गई और मित्रो की बधाइयां आने लगी पर उन मित्रो की बधाई नही आई जिसके साथ रोज चाय पर मुलाकात होती थी । एक दिन बाद फेस बुक पर उन लोगो ने भी बधाई दे कर औपचारिकता पुरा कर लिया । फिर मुलाकात हुई फिर एक बार बधाई दी गई पर मेरे नाट्य लेखन पर किसी ने चर्चा नही कि । जैसे कोई लाटरी है निकल गई लोगो ने बधाई दे दी अब क्या करना है यह जान कर की तुमने क्या लिखा कैसे लिखा क्या क्या समस्या आई । लोग इसके बाद बेकार की सारी बाते करते ,चुटकुला बोलते अपने साथी कलाकारो की जम कर आलोचना भी करते पर नाट्य लेखन और एवार्ड सेरेमनी की कोई बात नही करते। मै सोचता कि लेखन पर यह बात क्यो नही करते ? यह क्यो बचना चाहते है ? अगर कोई मुझे इन मित्रो के सामने लेट से बधाई भी दे देता तो यह तुरंत कोई दूसरी चर्चा शुरू कर देते । जैसे इनको यह डर लगा रहता कि कही सम्मान की चर्चा शुरू ना हो जाये । यह मेरे लिए सम्मान मिलने के बाद मिला दर्द था । कि मेरे मित्र मेरे नाट्य लेखन के बारे में कोई बात नही करना चाहते । धीरे धीरे मैं समझ गया कि यह सकारात्मक बिन्दु पर ना बात कर नकारात्मक विन्दु पर बात करना अधिक पसंद करते है । मैं इनके बीच अब मौन उपस्थिति दर्ज करने लगा । कुछ समय बाद मै दिल्ली गया और मुझे एवार्ड मिला अपने लिखे नाटक को मंच पर मचिंत होते हुए देखा । एन एस डी के डीन श्री अभिलाष पिल्लई ने अपने टीम के साथ नाटक को कमानी ओडीटेरियम में मचित किया ,,,लोगो ने नाटक को हाथो हाथ लिया पर एक लाल रंग से पीड़ित या प्रेरित आलोचक ने अपने फेस बुक पर नाटक की आलोचना की । मेरे दिल्ली के रंगमित्र मनीष सैनी ने मुझे उनका लेख पढने को दिया मैने कहा कि कोई बात नही नाटक लिखने मेरा काम है आलोचना करना उसका काम है । मनीष मुस्कुरा दिया । दिल्ली प्रवास की सारी जिम्मेदारी मेरे मित्र मनीष सैनी की थी जिससे मुझे लगा ही नही कि मै अपने शहर दिल्ली से दूर हूं,, उनका भरपुर सहयोग और स्नेह मुझे मिला जो आज भी तारों राजा है । एवाड मिलने के बाद मनीष अपने बाईक पर बैठा कर मुझे जामा मस्जिद ले कर गया जहां कि एक प्राचीनहोटेल पर मुझे सिंक कबाब खिलाया। मनीष को मेरे एवार्ड मिलनी की खुशी मुझ से कही अधिक थी । मै सोचने लगा काश यही खुशी मेरे उन मित्रो को होती जिनके साथ जिन्दगी की हर शाम गुजरती है। एवार्ड लेकर शहर लौटा तो मेरा ईमानदार मित्र हाथ में फुलो का गुलदस्ता ले कर अकेला मुस्कुराते हुआ रेलवे स्टेशन के बाहर खडा था ,,,यह देख कर ऐसा लगा कि चलो एक मित्र तो इस लौहे के शहर में ऐसा है कि जिसे मेरी खुशी में खुशी है और स्टेशन पर मुझे लेने आ गया । हम गले मिले सेल्फी ली और फिर बाईक पर निकल गये । दूसरे दिन के अखबार में खबरें नही छपी लोगो ने इसे उतना जरूरी नही समझा । पर मेरे एक बंगाली दादा है उन्होंन एक पुरा इंटरव्यु अपने अंग्रेजी अखबार में छापा उनका भी धन्यवाद करता हूं । आज इस घटना को एक साल से अधिक हो गये। हम मिलते है बहुत सारी बाते होती है पर नाट्य लेखन पर बात नही होती है । मेरे रंगमंच के सीनियर गुरूओं ने भी कोई उत्सुकत नही दिखाई । इस घटना को इगनोर किया । यह जो इगनोर करने की प्रवृति है यह बहुत पीडा देती है । इस लाईन की यह सच्चाई है कि हम आपके पास फेस बुक पर रहे ग और आपके अच्छे काम को इगनोर करेगे । हम आपके साथ चाय पीयेगे और आपके काम पर कभी बात नही करेगे ।हम आपको इगनोर कर ईगनोर करने का मजा लेंगे ।पीठ पीछे आपकी खिल्ली उड़ायेंगे और सामने आने पर बनावटी अपना पन जातयेगे ।मैं इस घटना के बाद उन लोगो से कट गया हूं जो आपके पास खडे रह कर आपको इगनोर करने का मजा लेते है ।झूठ-मूठ का मोबाईल पर व्यस्त होने का नाटक करेगे । पर आपसे बात नही करेगे । ऐसे मिलना से मै एकांत में रहना अधिक पसंद करता हूं ताकि मै कुछ रचनात्मक कार्य कर संकु ।
प्रेरणा दयी लेख
ReplyDeleteमर्द को भी दर्द होता है।
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