श्री सत्य सांई और मेरे नाटक ।


बात दो हाजार एक है मुम्बई से वापस घर आया था । बहुत दिन हो गये थे एक सोलो नाटक करने की इच्छा थी। एक नाटक मैने लिखा हे मां तुझे सलाम नाटक 1971 के युद्ध पर था । भारतीये सैनिक जो युद्ध में पाकिस्तान द्वारा बन्दी बना लिये गये थे करीब उनकी संख्या 54 थी । युद्ध समाप्ती के बाद भी वो लोग पाकिस्तान की जेल में कैदी बने कर रख लिए गये थे । नाटक का रिहर्सल तुलसी भवन जमशेदपुर में शुरू हुआ तुलसी भवन इस नाटक को प्रस्तुत कर रहे थे । नाटक का निर्देशन मेरे रंगमित्र शिवलाल सागर कर रहे थे और विजय भूषण नाट्य संयोजक की भूमिका में थे । करीब एक माह के रिहर्सल के बाद शो हुआ और शो में जमशेदपुर के सभी रंगकर्मी आये । शो अच्छा हुआ पर और भी अच्छा हो सकता था अगर तुलसी भवन में जो ध्वनी की समस्या थी उससे प्रेक्षा गृह में पीछे  बैठे दर्शको को आवाज सुनाई नी दी । इको सिस्टम नाट्य प्रेक्षागृह के प्रतिकूल था । बहरहाल आगे के चार रो में बैठे दर्शको को नाटक अच्छा लगा । सभी ने अभिनेता के संवाद पर खूब तालियां बजाई । उस नाटक में मेरे पिता भी दर्शक के तौर पर मौजूद थे । उनका आर्शिवाद मुझे मिला । मेरे विचार से मेरे अप्पा जी ( पापा) का और मेरा यह दूसरा अवसर था जब वह मेरे नाटक में दर्शक बन कर आये थे । इसके बाद यह अवसर मुझे नही मिला । बहरहाल नाटक के मुख्य अतिथि थे रैपिड एक्शन फोर्स के कमाडिग आॅफिसर श्री मान सहौता सहाब उनको नाटक इतना पसंद आया कि नाटक समाप्त होने के बाद मंच से नाटक को अपने कैम्प में मचित करने का न्योता दिया और एक सप्ताह के बाद हम टेल्को नाटक करने के लिए पहूंचे । टेल्को मे रिंग रोड पर संगीत समाज है जिसकी स्थापना 1958 में की गई थी उस संगीत समाज में एक प्रेक्षा गृह भी है जिसमे मेरे नाटक का शो होना था।  सुबह जब हम तीन लोग तुलसी भवन में मिले तो शिवलाल जी और विजय भूषण के बीच यात्रा को लेकर कुछ विवाद होगया । मैं चुकी बिलकुल इस तरह के विवाद के लिए नया था। मैने प्रयास किया की विवाद समाप्त हो जाये और हम नाटक को बेहतर तरीके से मंचित कर सके । पर विवाद इतना बड गया कि दोनो में मतभेद हो गया। अब शिवलाल जी मुझ से बोले कि रवि हम नाटक नही करेगे । और विजय जी बोले रवि जी नाटक तो आपको करना है । शो मस्ट गो आन ।  मेरी समझ में नही आ रहा था कि मै क्या करू एक तरफ नाटक का निर्देशक दूसरी तरफ तुलसी भवन का नाट्य संयोजक।  किसका साथ दूं ? मैने कहा मै नाटक की परम्परा का साथ दूंगा और नाटक करूगा ,बाद में विवाद को देख लेंगे। मेरी यह बात का असर क्या हुआ मै नही जानता पर मुझे अकेला ही नाटक करने टेल्को संगीत समाज जाना पडा । जहां मंच को एक जेल का रूप दिया जा रहा था । मै शाम तीन बजे एक हल्क सा माईक सांऊड का रिहर्सल लिया । उस नाटक में रिकाॅडेट सैनिक की पत्नी की आवाज जो पत्र के रूप में आती है ।मंच पर मै अपनी पत्नि का पत्र निकालता हूं और उसकी टेप की हुई आवाज आने लगती है । इस तरह से करीब चार पत्र नाटक के बीच बीच में मुझे पढना होता है । मैने रिकाॅड की गई पत्नी की आवाज वाला कैसेट स्वयं चेक किया और अपने साउंड रिकाॅडिस के टेप में स्वयं फिट किया चला कर देख और विगनिंग पाॅइट पर कैसेट तैयार कर ग्रीन रूम में मेकअप के लिए चला गया । तब शिवलाल जी आये और बोले । यार शो के लिए आल दा बेस्ट मै आ गया हूं तुम शो करो । मै उनसे अधिक बात नही कर सका क्यो कि पैंतालीस मिनट तक मुझे मंच पर शो करना था इस लिए मेकअप के बाद मेडिटेशन में चला गया। चूंकि फौजी टाईम टेबल के अनुसार शो शुरू हो गया।  पर जैसे ही मैने अपनी जेब से पहला पत्र निकाला और पढना शुरू किया टेप से तीसरे पत्र का वाइस ओवर आना शुरू हो गया।  मै मंच पर दस सेकंड के लिए रूक गया।  साउंड रिकाॅडिस को समझ में आया उसने साउंड बन्द कर दिया और मैने अपना पत्र पढना शुरू कर दिया । चूंकि जो पत्र मेरे हाथ में था, वो बिलकुल कोरा था और लगभग दो पन्न का पत्र था। ईश्वर की कृपा से जितना याद आया बोलता चला गया और इस पत्र के पड़ाव को पार गया ।मेरा कानफिडेस बड गया । मैने मन ही  मन तय  कर लिया की दूसरे पत्र में गडबडी होगी तो मै इसी तरह इमोपरवाॅईज करते हुए काम करूगा । पर दूसरा पत्र ठीक ठाक आ गया । शो समाप्त हुआ मै शिवलाल भाई से बोला आखिर वो कौन है जिसने मेरे लगाये टेप से छेड़ छोड की । साउंड रिकाॅडिस ने कहा मै नही कह सकता दस मिनट के लिए मै बाहर गया था । शो समाप्त हो गया।  बात आज भी मेरे मन में अटकी हुई है कि किसने मेरे टेप के साथ छेड़ छाड की । शो के बाद रैपिड एक्शन फोर्स के तरफ से डिनर के लिए हम सभी आमंत्रित थे पर डिनर के लिए हम तीन लोग ही शामिल हुए मै विजय भूषण और तुलसी भवन से निकलने वाली पत्रिका तुलसी प्रभा के संपादक प्रेमचंद मंधान जी । चुकी रात बहुत हो चुकी थी तो मुझे मंधान जी ने कहा कि आप संगीत समाज में रूक जाये । मै सहमत हो गया । उस रात मेरी मुलाकात एक महान हस्ती से हुई संगीत समाज के संस्थापक पंडित आनंद चन्द्र चौधरी लगभग साठ साल से उपर गोरा रंग मीठी आवाज सिल्क का  कुर्ता पाजामा पहने हाथ में छडी लिए जैसे ही मिले उनका पहले वाक्य मेरे लिए निकला ,,आप तो छुपे रूस्तम है,, । आपने बहुत अच्छा काम किया । मैने उनका चरर्ण स्पर्श किया और उन्होने अपना हाथ मेरे सिर पर रख दिया। । उस रात हम दो दिवाने नाटक संगीत पर देर तक बाते करते रहे । यहां से एक सूत्र निकला श्री सत्य साई से मिलने । कैसे  हुआ ? मै एक प्रोफेशनल एक्टर राईटर कैसे श्री सत्य साई पूट्टापर्ति पहूंच और पूट्टापर्ति के मंच पर नाटक की शुरू वात हुई ? क्या क्या हुआ और कैसे कैसे घटना क्रम ने रूप लिया । यह अगली कडी में आपके साथ साझा करूगा । तब तक आप अपना खूब ख्याल रखे । अपनी प्रतिक्रिया में अपना नाम और सेल नंबर जरूर लिखें।  आपने मेरे जीवन अंश को पढा इसके लिए मै आप सभी का आभारी हूं । 
🙏🙏🙏🙏🙏रवि कांत मिश्र 
8757122773 ।

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