श्री सत्य साई की मायावी दुनियां और मैं


गणेश गेट के बाहर और गणेश गेट के भीतर दो दुनियां है एक साईं बाजार की दुनियां जिसमे वो हर चीज उपलब्ध है जो एक बाजार में उपलब्ध होना चाहिये पर हर दुकान चाहे वह मुस्लमान का हो या ईसाई का सत्यसाईं के नाम और तस्वीर से शुरू होता है ।दुनियां भर के लोग इस बाजार में घूमते दिखाई दे जायेगे । बाजार का कोई धर्म नही होता बाजार का एक ही धर्म होता है अपना विस्तार करना और सत्य साई
 को केन्द्र में रख कर जिस बाजार का विस्तार गणेश गेट के बाहर हुआ था उसका सत्यसाईं के विचार और दर्शन से कोई लेना देना नही था । सब भरपूर लाभ कमाने के लिए बैठे थे । बहरहाल हम सभी गणेश गेट के भीतर सत्यसाई की मायावी दुनियां में प्रवेश कर गये । जहां सफेद वस्त्र पहने लोगो की भीड थी । करीब करीब दो सौ बीस देशो के लोग यहां एक साथ हंसते बोलते खाते पीते बात करते दिखाई दे रहे थे । सिक्योरिटी चैकिंग के बाद हमलोग को एक बडे से हाल में रहने की जगह दी गई । मुझे भीड में रहने की आदत नही थी ।मैने अपने लिए अलग कमरे की मांग की पर मेरी मांग पर ध्यान नही दिया गया । मुझे परेशानी हो रही थी । गीता सरदाना से मैने बात की गीता जी ने मुझे समझाया कि हम सभी लोगो को स्वामी यही कमरा दिये है। आपको इस बडे से हाल मे एक छोटा सा कमरा नुमा बना हुआ है उसमे आप रह ले । मै इस बात पर बहुत नाराज हो गया और बोला यह तो मेरे साथ अन्याय है । एक निर्देशक को आप इस तरह ट्रीट कर रहे है और बाकि लोग जो समिति के अलग अलग पद पर है उनके लिए अलग से कमरा उपलब्ध करवाया गया है । पर एक कमरा उस व्यक्ति के लिए आपके पास नही है जो पुरी टीम को लीड कर रहा है । आपको कलाकरो
 को ट्रीट करना नही आता । मै सामान उठा कर बाहर होटल के लिए निकलने लगा तभी गीता जी बोली आप ऐसा ना करे । किसी तरह एडजस्ट कर ले । चुकी मैं गीता जी की बात नही मानना चाहता था पर ना जाने क्यो मैं उनकी बात टाल नही सका । अब सब लोग एडजस्ट हो गये । शाम हुई एक रिहर्सल हुआ । जिसमे स्वामी के कुछ डिवोटी देखने भी आये । सभी को नाटक पसंद आया । अर्थी वाली बातो किसी का ध्यान नही गया । मैने सोचा चलो अच्छा हुआ । मै शाम को हाल से निकल कर बाहर बाजार की दुनियां में आ गया।  साई राम की ध्वनी से वाता वरण गूंज रहा था । साईकुलवंत हाल में स्वामी दर्शन दे रहे थे लोगो ने कहा कि चलिये स्वामी के दर्शन के लिए मैने कहा मुझे तलब लगी है मै बाहर जा कर अपनी तलब मिटाऊगा । एक सिगरेट पीने है । मुझे बाहर जाना है बाहर निकल कर मैने अपनी तलब मिटाई । साई भजन लाउडस्पीकर पर गूंज रहा था । अचानक लोगो की भीड साई कुलवंत हांलके तरफ भागने लगी ।साईं कुलवंत हांल को लोगो ने चारो तरफ से घेर लिया था । मैने सिगरेट का धुआं मुहं से बाहर निकलते हुए पान वाले यूपी के भैया से पुछा यह क्या हो गया सब कुछ शांत हो गया लोग पत्थर की मूर्ति की तरह खडे हो गये।  पान वाले  ने कहा अरे भैया स्वामी दर्शन देने आ गये । इस लिए पुरा बाजार खाली हो गया है । मैने सोचा भाई जरूरू यहां नाटक चल रहा है । यह लोग सत्य के नही स्वामी के प्रेमी है क्यो कि सत्य भीड के साथ चलना से नही जानता ।गौतम बुद्ध ने कहा है कि आप दिपो भवः यहां तो सभी लोग उस व्यक्ति के तरफ भाग रहे है जो यहां का प्राण है । चलो मै भी दर्शन कर लू । मै भी चला गया सामने हजारो लोगो की भीड में गेरू वस्त्र पहने एक समान्य कद का आदमी धीरे धीरे चल रहा है । हवा में अपने हाथ को धीरे धीरे हिलाते आगे बड रहा है लोग उसके चरर्णो की धूली को अपने सिर पर लगा रहे है । उस व्यक्ति का चेहरा चांद की तरह गोल और संवाला था ।सिर पर घुंघराले बालों का एक ताज ।ऑखों में करूणा लिए सभी के तरफ देखते हुए वह लगातार आगे बडते जा रहे थे । उनकी चला से शांति की तरंगें हवा में फैलती  जा रही थी । पहली नजंर में मुझे लगा कि यह व्यक्ति भीतर से शांत हो चुका है । गौतम भी इसी तरह शांत हो गये होगे । मैने मन ही मन कहा मुझे मेरे नाटक के  चरित्र गौतम बुद्ध का बोध हुआ । मै इस महामानव को प्रणाम कर अपने उसी हाल के तरफ चल दिया । करीब एक किलो मीटर पैदल चलने के बाद मै अपने हाल में पहूंच  तो हाल खाली था । थोडी देर बाद सभी लोग आये गीता जी हाथ में नाटक को बोर्सर लेकर आई जो बहुत ही सुसज्जित और कलात्मक बोर्सर था। कवर पेज पर गौतम बुद्ध की ध्यान करती हुई तस्वीर । नाटक का नाम सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध तक,, पन्ना पल्टा तो नाटक की कथा वस्तु । फिर बच्चो की तस्वीर नाटक के दृश्य के । अंतिम पन्ने पर स्वामी का सन्देश । मेरा कही नाम नही । मैने आश्चर्य से गीता जी के तरफ देखा।  वह समझ गई वह तुरंत बोली कि हम लोग आपका नाम नही दे सकते । क्यो कि हम लोग यह मानते है कि यह स्वामी का प्रोजेक्ट है स्वामी ही इस प्रोजेक्ट को कर रहे है । मेरा तो दिमाग उबलने लगा । मैने कहा आप क्या मानती है मुझे उससे कोई समस्या नही है। रात दिन मेहनत मैने किया पीछलेतीन महीने से नींद मुझे ठीक से नही हुई । आपके प्रेसिडेंट मुझ पर सभी के सामने रिएक्ट किये और आप बोल रहे है कि सब कुछ स्वामी कर रहे है । इसलिए आपका नाम हम लोग नही दे सकते । गीता जी आप लोग सिर्फ भाषाण में कहते लव एवरी वन नेभर  हर्ट एनी वन ,पर जब से यह प्रोजेेेेक्ट में काम कर रहा हूूं आप लोग मुझे हर्ट कर रहे है । आप लोग ने मुझे समझ क्या लिया है । कभी हमारे थियेटर में आये तो आपको मालुुम होगा कि डायरेक्टट क्या होता है । मै अभी यह प्रोजेक्ट अपने को अलग करता हूं । यह सुन
गीता जी मुझे समझने लगी पर मैं कुछ नही सुन पा रहा था । दिमाग की नसों में रक्त संचार तेजी से बड गया था । अपमानित मेहसूस करने लगा था । मन बार बार यह कह रहा था कि यह लोग मुझे सम्मोहित करने का प्रयास कर रहे है । आपने विचार मुझ पर थोपने की कोशिश कर रहे है जो मैं होने नही दूंगा।  मेरी अपनी सोच है और मै उधार की सोच के साथ नही जीता।
आज इतना ही 
धन्यवाद आभार आप सभी का 🙏🙏🙏🙏

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