सत्य सांई की मायावी दुनियां और मैं
दूसरे दिन सुबह मुझे एक बिल्डिंग में ले जाया गया जहां मेरी मुलाकात एक व्यक्ति से हुई अधेड़ उम्र के हंसमुख व्यक्ति नाम उनका याद नही आ रहा है शायद बसीर था । उनके पास डबल कैसेट वाला टेप रिक्रडर था जिसमे नाटक के कैसेटलगे हुए थे । मुझ से कहा गया कि आप इसमे से एडिट कर ले । मैने फिर अपना माथा पीट लिया कि यह क्या समझ रहे है । इनको कुछ मालुम नही है । एडिटिंग बिना स्टूडियो के संभव नही हो सकता मुझे स्टूडियो दे ,तभी एडिटिंग हो पायेगी मेरी बात को समझने मे उनको समय नही लगा पर उनके पास यही एक एडिटिंग टेप रिकार्डर था । मैने भी सोच लिया कि चलो काटना ही तो है। मैने अपनी सारी कविता और वाइस ओवर को काट दिया । तब भी नाटक चालिस मिनट का हुआ । फिर मैने सिद्धार्थ के जन्म और हिमालय से साधु का आना काट लिया । अब नाटक शुरू ही हो रहा था सारथी के साथ रथ में बैठ कर जाने से । तब जा कर नाटक पैतीस मिनट का हुआ । मैने कहा कि अब कुछ भी नही काटा जा सकता । इस कैसेट को रिकार्ड करवा ले किसी स्टूडियो मे जो डिलिट पार्ट है उसे मैने इरेज कर दिया है । वह लोग कैसेट लेकर चले गये दोपहर लंच से पहले कैसेट ले कर आये । पैतीस मिनट का नाटक । मैने लंच के बाद नये कैसेट से रिहर्सल शुरू किया । तो राजा साधु सेनापति पुरोहित और दरबारी सब एडिट हो गये । लगे सब रोने उन बच्चो के साथ जो माता पिता आये थे वह लोग भी रोने लगे। मैने बहुत समझाने का प्रयास किया पर वह लोग रोते जा रहे थे ।मैने उनसे कहा कि आप लोग चौधरी जी स्टेट प्रेसिडेंट से बात करे। कोई उनके पास नही गया सभी वही बैठे रहे । मैने अपने काम पर फोकस किया रिहर्सल शुरू कर दिया । समस्या आने लगी बच्चे संवाद के साथ तालमेल बैठाने में असफल होने लगे। मैने सभी को योगनिद्रा करवाई फिर रिहर्सल शुरू किया तो कुछ कुछ रिदम पकड़ने लगा शाम तक नाटक फिर दौडने लगा । शाम को सभी आये चौधरी जी गीता जी और सरस्वती राव जी सभी ने नाटक देखा और कुछ नही बोले चले गये । मै संजय के साथ बाहर निकल गया नार्थ इंडियन कैटिन में खाना खाया । फिर गणेश गेट से बाहर निकल गया ।करीब दो तीन किलोमिटर पैदल चलता रहा ।हम दोनों ही तनाव में थे ।कि अच्छा भला नाटक का पोस्मार्टम कर उसकी मां बहन एक हो गई थी । मै पहली बार जोर से चीखा कि किसी मायावी लोगो के बीच फंस गया हूं जिनका अपना कोई विजन नही है। स्वामी ने यह कहा तो ठीक है । स्वामी ने मना कर दिया तो ठीक है । अबे उपर वाले तुम्हे दिमाग क्या फ्रीजर में रखने को दिया है ।यह लोग अपनी बात स्वामी के पास रखते क्यो नही कि मेरे हिसाब से यह गलत है ।यह सही है ? अपने दिमाग का उपयोग क्यो नही करते । अच्छा भला नाटक को बिना सोचे समझे कटवा दिया। स्वामी विवेकानंद की बात याद आ गई कि ईश्वर को अगर तुम्हे अपना दास बनाना होता तो तुम्हे बुद्धि विवेक और ज्ञान इंद्रियां देने की क्या आवश्यकता थी । बिना सिर के इंसान पैदा कर देता। संजय बोला भैया यहां जो कुछ भी होगा वह स्वामी के कहने पर होगा । यह लोग सिर्फ आज्ञा पालन करने वाले भक्त है । इस पर मैने कहा कि अंध भक्ति और होश पूर्ण भक्ति में भेद होता है । दरअसल यह लोग सभी अंध भक्त है । इस देश में अंध भक्तों की लंबी परम्परा रही है ।हम भगवान पर डिपेंड रहे,,, बेचारा भगवान हम पर डिपेंड था इस लिए अपने काम को आगे बढ़ाने के लिए हमें संसार में भेजा कि अपने बुद्धि का विकास कर ,सृष्टि के काम को आगे बडायेगा । पर यह लोग यहां पैदा हो कर उल्टा भगवान पर डिपेंड हो गये । साला भगवान भी इनको पैदा कर अपनी गलती पर अपना माथा पिटता होगा ।चल बे वापस चलते है आश्रम के तरफ ,,,,नही तो गेट बंद हो गया तो रात सडक पर बीतानी होगी।इस पर संजय ने कहा भैया मजा आ जायेगा । हां मजा तो आ जायेगा पर गुरू जी रात भर परेशान होते रहेगे। कहीं ऐसा ना हो कि रात भर गीता जी को सोने ना दे । यह सोच कर हम वापस गणेश गेट के तरफ लौटने लगे। उस रात जब हम हाल में पहूंच तो गुरू जी गरम पानी पी रहे थे । यानी गुरू जी फ्रैश होने जायेगे । हम देखते ही बोले अरे बाबा कहां रह गये थे। मैने कहा बाहर टहलने चले गये थे । गुरू जी संजय को देख कर बोले मेरी मदद करो नही तो मेरा पेट गैस से फट जाये गा। तुम चौकीदार करो दरवाजे के बाहर बस किसी को दरवाजा खटखटाने मत देने। संजय मेरी तरफ देखा मै मुस्कुरा दिया इस पर संजय भी मुस्कुरा दिया। संजय गुरू जी के साथ बाथरूम के तरफ चला गया। तभी मेरे वो स्टूडेंट के माता पिता आ गये जिनके बच्चो का रोल नाटक में कट गया था । सभी गुस्से में थे समिति और समिति के लोगो के बारे में भला बुरा कहने लगे । मै चुपचाप सुनता रहा थोडी देर बाद एक महिला बोलते बोलते रोने लगी । इसके बाद वो लोग चुप कराने लगे जिनका रोल नही कटा था। कुल मिला कर मामला गमगीन हो चुका था । बहुत से बच्चे बिना भोजन किये सो गये थे । यह सब देख मेरा दम घुटने लगा पर बोले तो किसे बोले । इनके पास वही रटा रटाया एक ही जबाव था । स्वामी का आदेश है । इस पर मेरा माथा ठनका कि स्वामी का आदेश नही हो सकता । स्वामी इतना कठोर नही हो सकते ।यह आदेश किसी और का है चाहे वह आल इंडिया प्रेसिडेंट का हो या किसी और का ।इस खेल में कुछ तो बात है । मुझे इसमे राजनीति की बू आने लगी । सम्मोहन विदा का एक नियम है पहले इंसान की भावना को जागृत करो फिर जब भावना पुरे होने की मांग करे तो भावना के आगे बाधा खडी कर दो । इंसान छटपटायेगा उससे छटपटाने दो । जो इस समय लोग और उसके बच्चे छटपटा रहे थे । अब अगली चाल होगी मास्टर स्टोक । और सारे खाने चित हो जायेगे । वह मास्टर स्टोक क्या होगा यह मुझे कल सुबह मालुम हो जायेगा। अगर मै सही दिशा में सोच रहा हूं तो मेरा अनुमान सौ प्रतिशत सही होगा । नाटक फुल लेंथ होगा। पुरा नाटक होगा । यह सब नाटक के उपर नाटक खेल रहे है ।
तभी गुरू जी बाथरूम से वापस आ गये उनके चेहरे पर इत्मीनन का भाव था यानी पेट साफ हो गया था। मैने संजय के तरफ देखा तो वह मुस्कुरा दिया ।
मै भी मुस्कुरा दिया ।
आज इतना ही ।
आप सभी का आभार । नाटक फुल लेंथ होगा कि नही मेरा अनुमान सही होगा या नही । यह अगली कडी में
आप सभी लोग जिस मनोयोग और तन्मयता से इस संस्मरण को पढ़ रहे अपनी सार्थक प्रतिक्रिया मुझे दे रहे है । उन सभी का आभार ।
कुछ नाम लेना चाहूंगा। पार्थो भट्टाचार्य जी । कुंदन जी ,जुही समर्पिता जी मनोहर जोशी जी । डां जितेन्द्र जी ,दिनकर शर्मा जी ,लोना मैम जी ध्रूवदा ,आप सभी का विशेष आभार आप लोग लगातार पढ कर अपनी प्रतिक्रिया मुझे दे रहे ।
🙂🙂🙂🙂

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