सफर अभी बाकी है
रात काफी हो चुकी थी। अ ऑख बन्द किये विस्तर चीत लेटा हुआ था । नींद उसकी ऑखो से गायब हो चुकी थी । अ ने सोने की कोशिश नही की ,दिमाग और दिल में जो कुछ उबल रहा था उसे वह बांटना चाहता था । किसी से कहना चाहता था। पर इतनी रात गये जीत को वह जगा नही सकता था । उसने तय किया कि वह एक लैटर मैम को लिखेगा । उस खत कि शुरूवात कुछ इस तरह हुई ,,,,,,,,,,, ,,,,,,,,,,,,,
डियर मैम
आप इस समय गहरी नींद में होगी पर मैं जाग रहा हूं । आपको यह कभी ख्याल में नही आ सकता कि कोई आपके ख्यालों के साथ जाग रहा हो । जागता मैं पहले भी था पर उस जागने में एक नशा मेरे उपर छा जाता था । आज वो नशा कही खो गया है । मैं उसकी तलाश में हूं और वो कहीं दूर तक इस रात की तन्हाई में दिखाई नही देता । आपने यह क्या कर दिया मुझे ,,आपका दिया हुआ पेन कही टीस मारने लगा । यह आपने जान बुझ कर किया है या अनजाने में किया है । मै नही जानता । पर कुछ कुछ होने लगा है ,धीरे धीरे मेरे भीतर कुछ बदल रहा है ।
मै पहले ठीक था अपनी दुनिया में, आपके साथ जी रहा था । जब से आपके घर से वापस लौटा हूं तब से सब कुछ बदलता जा रहा है । मै पहले वाली जिन्दगी में वापस जाना चाहता हूं पर उसके रास्ते मेरे लिए बंद हो गये। आगे जो रस्ता है वह मुझे भयभीत करने लगा है । मैं अपने को अपनी भवाना को छुपा कर रखना चाहता हूं । यह मेरा नेचर है । मैं कैसे इस सफर पर निकल गया । मैं नही जानता ।सफर ने मुझे चुना या सफर को मैने चुना यह भी नही जानता ।बस पहली बार आपको देखा तो देखता ही रह गया। उस लम्हा मै खुद को भूल गया था। किसी छोटे से लोहे की कण की तरह मैं आपकी तरफ तेजी से खींचता चला गया । जो आज भी जारी है । शुरू शुरू में आपकी मौजूदगी में सांसे लेना आपको सुनना,आपको देखते रहना ,मेरे लिए जलते रेगिस्तान में बरगद की छांव की तरह था। मै अपने मन की डोर पकडे आपके पीछे अपनो कल्पना के दुनियां में उड रहा था । मन जैसा कहता मैं वैसा ही करता । मेरे मन ने कहा कि आपके हथेली से गिरे चॉक उठा लूं ,उठा कर रख लिया ,जो आज भी मेरे छोटे से बक्से में एज इटिज है । मै चोर नही था मैने कभी चोरी नहो की, पर मन ने कहा कि आपकी पेन चुरा लूं तो चुरा लिया । मन ने कहा बोतल चुरा लूं आपकी बोतल चुरा ली । मन ने तकिया चुराने को कहा वो भी चुरा लिया । मै चोर बन कर खुश था । क्यो कि मन ने जो कहा वही मैने किया । पर अब मन कंफियूज हो गया है । वो चोरी किये हुए समानो को वापस करना भी चाहता है और नही भी चाहता ।आप को देखना भी चाहता हूं और आपको देख कर अपनी ऑखे बंद भी करना चाहता है । आपसे कुछ कहना चाहता है और आपसे वही छुपना भी चाहता हैं। यह क्या होने लगा है मेरे साथ? आपके घर के तरफ दौड कर जाना चाहता हूं और कहना चाहता हूं कि आपके समान की चोरी मैने की है।मैं चोर हूं , मुझे माफ कर दे ,पर आपसे अपना यह रहस्य छुपाना भी चाहता हूं कि मैं चोर बन गया हूं । मैम मैं पहले जैसा होना चाहता हूं । मैम मैं पहले जैसा होना चाहता हूं । इतना लिख कर अ ने चोरी की हुई पेन को लैटर पैड पर रख दिया। एकटक लैटर और उस पर रखे पेन को देखता रहा । काफी देर तक वह चुपचाप इसी तरह बैठा रहा । एक खामोशी बाहर थी जो धीरे धीरे गुजर रही थी । रात के दिल में उतरती खामोशी । एक खामोशी उसके भीतर उसके मन की दिवारों से टकरा रही थी । जो इस रात के साथ साथ गुजर जाना चाहती थी । पर ऐसा हो ना सका रात गुजरती रही और खामोशी उसके मन के दिवारों पर दस्तक देती रही । इस तरह सुबह हो गई पर अ के मन के आकाश में रात ठहर गई थी । अ वही ठहर गया था उसी पल के साथ रूक गया था । लैटर पेड और उस पर रखे पेन उसी तरह रखे हुए थे । तभी दादी ने दरवाजे पर दस्तक दी । टक टक टक ,,आनंद वो आनंद उठ जाओ बेटा , जी दादी मां जाग रहा हूं । अ झट पेन और लैटर को उठा कर अपने छोटे से लोहे के बक्से में छुपा दिया । एक नजर सामने उस कुर्सी पर डाला ।जिस पर बैठ कर उसने रात गुजार दी थी । एक पल के लिए उसे ऐसा लगा कि एक अ अब भी कुर्सी पर उसी तरह बैठा हुआ उसकी तरफ देख रहा है । अ ने अपने आप को एक झटका सा दिया और खुद से बोला यह क्या हो रहा है ,,मैं यहां हूं तो कुर्सी पर कौन बेठा मेरी तरफ देख रहा ।कहीं यह मेरे जीवन के ठहरे हुए पल तो नही । इतना बोल वह अपने कमरे से बाहर निकल गया । तभी फोन की घंटी बजी ,,,दादी फोन उठा कर बोली हैलो ,,दूसरी तरफ से प्रो सहाब बोले आनंद से बात करनी है । दादी बोली अभी बुलाती हूं ।आनंद तुम्हारा फोन है । आनंद तेजी से फोन के पास आया और रिसीवर ले कर बोले हैलो , दूसरी तरफ से प्रो सहाब बोले आनंद याद है ना कल सन्डे है और हम तीनो पहाडों पर घुमने जायेगे । आनंद एकदम से बोला जी याद है । पर वह भीतर से एक बार फिर सिहर गया । एक विधुत तरंग उसके नाभी से उठ कर उसके दिल पर जोर दस्तक दी । वह खामोश हो गया था ।तभी प्रो सहाब की आवाज उसके कान के परदे से टकराई ,, कल सुबह तैयार रहना हम दोनो तुम्हे लेने आ रहे है । नही सर आप क्यो तकलिफ करेगे मै ठीक समय पर आ जाऊंगा । इतना बोल कर वह गहरी सांस ली और छोड दी । प्रो सहाब बोले ओ के तब कल मिलते है सुबह पांच बजे । इतना बोल फोन कट हो गया । अ फोन रख कर वही खडा है गया उसके मन ने कहा कोई सोलिड बहाना खोज ले ,,।।
आज इतना ही । आज के पाठक श्री मनोहर जोशी भाई जी ने मुम्बई से फोन कर मुझे यह लिखने के लिए शुभकामना दी । मैं उनके प्रति और सभी मित्रो के प्रति जो फेस बुक और वाटसप पर सार्थक सकारात्मक प्रतिक्रिया कर रहे है । उनका धन्यवाद करता हूं उनके प्रति आभार प्रकट करता हूं । 🙏🙏🙏🙏🙏🙏रवि कांत मिश्र

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