क्या रंगकर्म कहा जा सकता है ? भारत के कस्बों गांवो में प्राचीन परंपरा रही है कि नाटक खेले जाते रहे है । रामलीला कृष्ण लीला । डाकू कि कहानी पर नाटक होते रहे है नौटंकी की शैली में नाटक होते रहे है। पर जब से आधुनिक रंगकर्म की शुरू वात हुई । रंगकर्म को यथार्थवादी दृष्टि से लिखा गया और उसे मंचित किया गया। तब दो बाते सामने आई । पहला यह कि रंगकर्म सिर्फ समाज का दर्पण नही है ।वह समाज का अंतर्दृष्टि रखने वाला दर्पण है । जैसे समाज जिस मेकअप को लगा रखा है या जिस मुखौटा का प्रयोग कर समाज के सामने जो उदाहरण प्रस्तुत करता है ।उस उदाहरण की वास्तविकता को परखता ठोकता बजाता है रंगकर्म । यह परखने ठोकने बजाने की जो अंतर्दृष्टि है यही रंग कर्म की आत्मा है चेतना है । सिर्फ नाटक करना ऐसे नाटक करना जिसमे सब कुछ पहले से ही तय है । वही राम वही रावण वही सीता का अपहरण वही हनुमान जी का अवतरण । इसमें आप वही करेंगे जो होता आ रहा है । आपको यह छुट नही है कि आप एक रत्ती भी हेर फेर कर सके । कुछ लोगो ने इस प्रयोग करने कि भरपुर कोशिश की पर उनको अपार जनसमूह का समर्थन प्राप्त नही हुआ । बहरहाल हम अपनी रंगचितन पर रंगचेतन पर वापस आते है । राजतंत्र: से निकल कर जब रंगमंच प्रजातंत्र के दरवाजे पर दस्तक दे रहा था जब आजादी की लडाई में नाटक अपनी क्रांतिकारी भूमिका में था तब जिस रंगचेतन ने दर्शको के मन में शोषण अत्यचार के विरुद्ध आग्निमंत्र फूका था वह उस काल का उत्कृष्ट रंगकर्म था । अंधेर नगरी चौपट राजा, भारत दुर्दशा, नील देवी जैसे नाटक ने प्रजा के मन में उस सत्ता की जो छवि प्रस्तुत कि वह रंगकर्म का अंतर्दृष्टि था । जो रंगदर्पण में अभिव्यक्त चेहरे के भीतर चेहरे को बाहर खीच निकाला । यही से रंगकर्म खास कर हिंदी रंगकर्म को अपना आस्तित्व मिला । अब रंगकर्म कोई सत्ता या व्यक्ति का स्तुतिगान करने वाला माध्यम नही रहा । रंगकर्म भांड नही रहा है जो वही बोले जिसमे सत्ता पक्ष के कानो को मिठा मिठा लगे । अब रंगकर्म अपनी भाषा में बोलने लगा । यह वह भाषा थी जिसमे समाज के अवचेतन का पोस्टमार्टम करने की शक्ति थी । अधिकार था प्रश्न को उठाने दृश्य:संवाद प्रतिको को गढ़ने उसकी बहुआयामी व्याख्या करने की क्षमता आ गई थी । यहां से नाटक को जो बौधिक गरीमा का अनुभव हुआ उससे समाज को एक ऐसा दर्पण मिला जो अपनी रंगदृष्टि से समाज के भीतर चल रहे द्वंद को उलझन को आक्रोश को समाज के समक्ष प्रस्तुत कर समाज को उसके अवचेतन से अवगत कराने लगा । पर यह चेतना वर्तमान शिथिल पडती जा रही है ।अब जो रंगर्कम का रूप से वह मल्टी कलर हो गया है जैसे हमारे कलर टीवी चैनल के जैसा । नाटक कर लेना एक शौक है । शौक पूरा करने के लिए पगला घोडा कर लेना और फिर हयबदन भी कर लेना। औरत नाटक भी करना और फिर किसी भी राजनैतिक दल के प्रचार के लिए नुक्कड़ नाटक कर लेना । फिर अंधेर नगरी चौपट राजा भी कर लेना। लगे हाथ मल्टी नेशनल कंपनी के लिए विज्ञापन नुक्कड़ नाटक भी कर लेना। कुल मिला कर रंगकर्म सिर्फ शौक पूरा करना या धन कमाने का एक माध्यम रह गया । इसकी चेतना अचेतन में विश्राम करने लगी । अब स्थिति यह है कि नाटक पुनः स्तुतिगान विज्ञापन नाटक बन कर रह गया। जैसी सत्ता वैसा ही नाटक ।सत्ता जो बोले जैसा बोले सब नाटक वैसा ही होगा । रंगकर्म अब विश्राम कर रहा है ।
रवि कांत मिश्र
सम्मान मिलने की खुशी और दर्द
सम्मान जब आपको मिलता है तो आपको खुशी तो होती है पर उस खुशी के साथ दर्द भी चला आता है । यह दर्द कोई और आपको नही देता है आपके आस पास रोज मिलने वाले जिसे आप अपना मित्र समझते है ,वही आपको यह दर्द देंगे। मै भुक्त भोगी हूं बीस साल के रंगमंच जीवन में पहली बार झारखंड से जमशेदपुर से मेरे नाटक "अंत से आरम्भ" को साहित्यकला परिषद नई दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान देनी की घोषणा हुई । बहुत खुशी हुई मै अपने सबसे नजदीक मित्र को फोन लगा कर सूचना दी ,,खुशी इतनी थी कि तुरंत मिलना हुआ । मित्र ने गले लगाया उनके साथ भी एक मित्र थे उनको कोई खास खुशी नही हुई बस औपचारिकता वश बधाई दे कर ऐसे मौन हुए कि फिर कोई प्रश्न ही नही किया वह अपने मोबाईल में व्यस्त हो गये । मै उम्मिद कर रहा था कि कुछ प्रश्न वह मुझ से पुछेगे पर नही । यह पहला दर्द का अनुभव हुआ कि इतने वर्षो तक साथ उठने बैठने सुख दुख बांटने के बाद आज सम्मान मिलने के बाद इतनी उदासीनता ,,,,,पर चलो कोई बात नही । मै अपने पहले मित्र के साथ बाते करने लगा और उसे धन्यवाद देने लगा कि तुम्हारे सहयोग के कारण मुझे यह एवाड मिला है । अगर तुम सही समय पर साहित्य...
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